केदारनाथरुद्रप्रयाग, उत्तराखंड
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में: केदारं हिमवत्पृष्ठे
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कहाँ है
केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले में, हिमालय की गोद में, लगभग साढ़े ग्यारह हज़ार फ़ुट की ऊँचाई पर है। मंदिर के पीछे बर्फ़ से ढकी केदार चोटियाँ खड़ी हैं, और पास से मंदाकिनी नदी बहती है। यह बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे ऊँचा है, और उत्तराखंड के छोटे चार धाम में भी इसकी गिनती होती है।
मंदिर बड़े-बड़े भूरे पत्थरों से बना है, और सदियों से बर्फ़, आँधी और ठंड झेलता आ रहा है। अंदर का शिवलिंग दूसरे ज्योतिर्लिंगों जैसा गोल नहीं, बल्कि एक ऊँची, तिकोनी चट्टान जैसा है, जिसे भगवान शिव की पीठ माना जाता है।
कथा: नर-नारायण की प्रार्थना
शिव पुराण में कथा है कि भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ऋषि बदरिकाश्रम में तपस्या करते थे। वे रोज़ मिट्टी का शिवलिंग बनाकर बड़ी श्रद्धा से भगवान शिव की पूजा करते थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए।
भगवान ने वर माँगने को कहा, तो नर-नारायण ने संसार के कल्याण के लिए विनती की, "प्रभु, आप यहीं केदार क्षेत्र में ज्योतिर्लिंग रूप में सदा विराजिए, ताकि भक्त आपके दर्शन कर सकें।" भगवान शिव ने यह मान लिया, और केदारेश्वर के रूप में वहीं बस गए।
कथा: पांडव और बैल
एक और प्रसिद्ध कथा पांडवों से जुड़ी है। महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने ही भाइयों और गुरुजनों के वध के दुख से भरे थे। वे भगवान शिव से क्षमा माँगना चाहते थे और उन्हें खोजते हुए हिमालय आए। पर शिव जी उनसे इतनी जल्दी नहीं मिलना चाहते थे। वे एक बैल का रूप लेकर दूसरे पशुओं के बीच छिप गए।
भीम ने पहचान लिया कि यह कोई साधारण बैल नहीं है। उन्होंने अपने दोनों पैर दो पहाड़ियों पर फैला दिए। सारे पशु उनके पैरों के नीचे से निकल गए, पर वह बैल नहीं निकला। जैसे ही भीम उसे पकड़ने लपके, बैल धरती में समाने लगा, और भीम के हाथ केवल उसकी पीठ, यानी कूबड़, आई।
पांडवों की लगन देखकर भगवान शिव प्रसन्न हुए, उन्हें दर्शन दिए और उन्हें क्षमा कर दिया। कहते हैं कि बैल की पीठ केदारनाथ में रह गई, और शरीर के दूसरे भाग हिमालय में चार और जगहों पर प्रकट हुए। इन पाँचों को पंच केदार कहते हैं: केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मध्यमहेश्वर और कल्पेश्वर।
मंदिर, शंकराचार्य और 2013
परंपरा कहती है कि यहाँ पहला मंदिर पांडवों ने बनवाया, और आदि शंकराचार्य ने उसे फिर से बनवाया। मंदिर के पीछे आदि शंकराचार्य की समाधि है। 2013 में आई भयंकर बाढ़ में आसपास बहुत कुछ बह गया, पर एक बड़ी चट्टान आकर मंदिर के पीछे रुक गई और पानी को दोनों ओर मोड़ दिया। लोग उसे भीम शिला कहते हैं, और मंदिर सुरक्षित रहा।
दर्शन और यात्रा
बर्फ़ के कारण मंदिर हर साल केवल अप्रैल या मई से अक्टूबर या नवंबर तक खुलता है। परंपरा से कपाट अक्षय तृतीया के आसपास खुलते हैं और भाई दूज पर बंद होते हैं। सर्दियों में भगवान की डोली नीचे ऊखीमठ ले जाई जाती है, और वहीं पूजा होती है। तिथियाँ हर साल मंदिर समिति की वेबसाइट पर देखकर ही यात्रा तय करें।
मंदिर तक सड़क नहीं जाती। गौरीकुंड से लगभग सोलह किलोमीटर की पहाड़ी पैदल चढ़ाई है, जिसके लिए घोड़े, पालकी और हेलीकॉप्टर की सुविधा भी मिलती है। सबसे पास का हवाई अड्डा देहरादून और रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। ऊँचाई ज़्यादा है, इसलिए गर्म कपड़े रखें, धीरे चलें, और स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
इस ज्योतिर्लिंग से हम सीखते हैं कि भगवान सच्ची लगन की परीक्षा लेते हैं, पर अंत में अपने भक्त को अपना ही लेते हैं। पांडवों ने हार नहीं मानी, और उन्हें शिव मिल गए। जय बाबा केदार, हर हर महादेव!