बारह ज्योतिर्लिंग की यात्रा कैसे करेंचार हिस्सों में पूरी यात्रा, कब जाएँ और क्या तैयारी करें
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पहले सोचें: एक साथ या हिस्सों में
बारह ज्योतिर्लिंग उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक, पूरे भारत में फैले हैं। सबको एक ही यात्रा में देखने के लिए लगभग तीन हफ़्ते चाहिए, और बहुत-सा सफ़र हवाई जहाज़ और रेल से करना पड़ता है। इसलिए ज़्यादातर भक्त इन्हें चार इलाक़ों में बाँटकर, अलग-अलग समय पर यात्रा करते हैं। दोनों तरीके ठीक हैं, बस अपनी सेहत, समय और बजट के हिसाब से चुनें।
हर इलाक़े में दो से चार ज्योतिर्लिंग पास-पास हैं, और उन्हें एक बड़े शहर से जोड़कर देखा जा सकता है। नीचे चारों इलाक़े दिए गए हैं। अगर पूरी यात्रा एक साथ करनी हो, तो हमारी इक्कीस दिन की यात्रा योजना भी देख सकते हैं।
पश्चिम: गुजरात और मध्य प्रदेश
पहले इलाक़े में चार ज्योतिर्लिंग हैं: सोमनाथ, नागेश्वर, महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर। अहमदाबाद या राजकोट तक पहुँचकर सड़क या रेल से सोमनाथ जाएँ। वहाँ से समुद्र के किनारे-किनारे द्वारका पहुँचें, जहाँ द्वारकाधीश और पास ही नागेश्वर के दर्शन होते हैं।
फिर इंदौर पहुँचें। इंदौर से उज्जैन का महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर, दोनों सड़क से थोड़ी ही दूरी पर हैं, उलटी दिशाओं में। महाकाल की भस्म आरती देखनी हो, तो उसकी बुकिंग मंदिर की वेबसाइट पर पहले से कर लें।
महाराष्ट्र
दूसरे इलाक़े में तीन ज्योतिर्लिंग हैं: भीमाशंकर, त्र्यंबकेश्वर और घृष्णेश्वर। पुणे या मुंबई को आधार बनाकर गाड़ी से यात्रा सबसे आसान रहती है। पुणे से भीमाशंकर सह्याद्रि की पहाड़ियों में है, फिर उत्तर की ओर नासिक के पास त्र्यंबकेश्वर, और फिर पूर्व की ओर छत्रपति संभाजीनगर के पास घृष्णेश्वर।
घृष्णेश्वर के पास ही एलोरा की गुफाएँ हैं, इसलिए वहाँ एक दिन अतिरिक्त रखें। बरसात में यह पूरा इलाक़ा हरा-भरा और बहुत सुंदर होता है, पर पहाड़ी रास्तों पर सावधानी चाहिए।
उत्तर और पूर्व
तीसरे इलाक़े में तीन ज्योतिर्लिंग हैं, पर वे एक-दूसरे से दूर हैं: केदारनाथ, काशी विश्वनाथ और वैद्यनाथ। केदारनाथ के लिए देहरादून या ऋषिकेश पहुँचकर पहाड़ी रास्ते से गौरीकुंड तक जाते हैं, और वहाँ से पैदल चढ़ाई या हेलीकॉप्टर से मंदिर। केदारनाथ केवल गर्मियों से अक्टूबर या नवंबर तक खुलता है।
काशी विश्वनाथ के लिए वाराणसी पहुँचें, जो रेल और हवाई जहाज़ दोनों से अच्छी तरह जुड़ा है। वाराणसी से देवघर, जहाँ वैद्यनाथ हैं, रेल से जाया जा सकता है। देवघर का अपना हवाई अड्डा भी है।
दक्षिण
चौथे इलाक़े में दो ज्योतिर्लिंग हैं: मल्लिकार्जुन और रामेश्वरम। मल्लिकार्जुन के लिए हैदराबाद पहुँचकर नल्लमला के जंगलों से होकर सड़क से श्रीशैलम जाते हैं। रामेश्वरम के लिए मदुरै पहुँचकर रेल या सड़क से समुद्र पर बने पंबन पुल को पार करके टापू पर पहुँचते हैं।
रामेश्वरम चार धामों में से भी एक है, और मदुरै का मीनाक्षी मंदिर भी इसी रास्ते में है। इसलिए दक्षिण की यात्रा में दो-तीन दिन और जोड़ लें तो अच्छा रहता है।
कब जाएँ
ज़्यादातर ज्योतिर्लिंगों के लिए अक्टूबर से मार्च का मौसम सबसे अच्छा रहता है। पर केदारनाथ सर्दियों में बंद रहता है, इसलिए अगर पूरी यात्रा एक साथ करनी हो, तो उसे मई से अक्टूबर के बीच ही रखें। सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर हर ज्योतिर्लिंग पर बहुत भीड़ होती है। भीड़ से बचना हो तो ये दिन छोड़ दें, और उत्सव देखना हो तो ठहरने की जगह बहुत पहले तय कर लें।
तैयारी
हर मंदिर के दर्शन के समय, विशेष आरती की बुकिंग और नियम उसकी आधिकारिक वेबसाइट पर देखें, क्योंकि ये बदलते रहते हैं। कुछ मंदिरों में गर्भगृह में जाने के लिए पारंपरिक वस्त्र पहनने का नियम है। पहचान पत्र साथ रखें। केदारनाथ जैसी ऊँची जगह के लिए सेहत की जाँच करा लें, गर्म कपड़े रखें, और बीच में आराम के दिन ज़रूर रखें।
यात्रा जितनी लंबी हो, मन उतना ही शांत रखें। भीड़, देरी और थकान भी यात्रा का हिस्सा हैं। हर ज्योतिर्लिंग पर उसकी कथा याद करें, और भगवान शिव का नाम लेते रहें। हर हर महादेव!