21 दिन में बारह ज्योतिर्लिंगएक साथ पूरी यात्रा की दिन-ब-दिन योजना
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यह योजना किसके लिए है
यह उन भक्तों के लिए एक नमूना योजना है जो बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा एक ही बार में करना चाहते हैं। इसमें केदारनाथ भी है, इसलिए यह यात्रा मई से अक्टूबर के बीच ही हो सकती है, जब केदारनाथ के कपाट खुले रहते हैं। सफ़र का समय मौसम, भीड़ और साधन पर निर्भर करता है, इसलिए इसे पत्थर की लकीर नहीं, एक रास्ता दिखाने वाली योजना समझें।
हवाई जहाज़, रेल और होटल पहले से बुक कर लें। हर मंदिर के दर्शन के समय और विशेष आरती की बुकिंग उसकी आधिकारिक वेबसाइट पर देखें। जहाँ थकान लगे, वहाँ एक दिन आराम का जोड़ लें, यात्रा लंबी है।
दिन 1 से 3: सोमनाथ और नागेश्वर
पहले दिन अहमदाबाद पहुँचें और रेल या सड़क से सोमनाथ जाएँ। शाम को समुद्र किनारे सोमनाथ की आरती देखें। दूसरे दिन सुबह सोमनाथ के दर्शन करें, फिर भालका तीर्थ और त्रिवेणी संगम देखें।
तीसरे दिन समुद्र के किनारे-किनारे द्वारका पहुँचें। द्वारकाधीश के दर्शन करें, और फिर पास ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग जाएँ। समय हो तो नाव से बेट द्वारका भी देखें।
दिन 4 से 6: महाकालेश्वर और ओंकारेश्वर
चौथे दिन द्वारका से जामनगर या राजकोट होते हुए इंदौर पहुँचें, और रात उज्जैन में रुकें। पाँचवें दिन भोर से पहले महाकाल की भस्म आरती में शामिल हों, जिसकी बुकिंग पहले से करनी होती है। दिन में हरसिद्धि माता, काल भैरव और शिप्रा के घाट देखें।
छठे दिन इंदौर से ओंकारेश्वर जाएँ। नर्मदा पार करके ओंकारेश्वर और फिर ममलेश्वर के दर्शन करें। शाम तक इंदौर लौट आएँ।
दिन 7 से 10: महाराष्ट्र के तीन ज्योतिर्लिंग
सातवें दिन इंदौर से पुणे पहुँचें और एक गाड़ी ले लें। आठवें दिन सह्याद्रि की पहाड़ियों में भीमाशंकर के दर्शन करें, और शाम तक नासिक की ओर बढ़ें।
नौवें दिन सुबह त्र्यंबकेश्वर के दर्शन करें और कुशावर्त कुंड देखें, फिर छत्रपति संभाजीनगर की ओर निकलें। दसवें दिन घृष्णेश्वर के दर्शन करें और पास की एलोरा की गुफाएँ, विशेषकर कैलाश मंदिर, देखें।
दिन 11 से 14: केदारनाथ
ग्यारहवें दिन छत्रपति संभाजीनगर से देहरादून पहुँचें। बारहवें दिन पहाड़ी रास्ते से गुप्तकाशी या सोनप्रयाग की ओर जाएँ। यह रास्ता लंबा है, इसलिए सुबह जल्दी निकलें।
तेरहवें दिन गौरीकुंड से पैदल चढ़ाई करें, या पहले से बुक किए हेलीकॉप्टर से केदारनाथ पहुँचें, और बाबा केदार के दर्शन करें। ऊँचाई ज़्यादा है, इसलिए धीरे चलें और गर्म कपड़े रखें। चौदहवें दिन नीचे लौटकर देहरादून की ओर आएँ।
दिन 15 से 17: काशी विश्वनाथ और वैद्यनाथ
पंद्रहवें दिन देहरादून से वाराणसी पहुँचें, और शाम को दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती देखें। सोलहवें दिन सुबह गंगा में नाव की सैर करें, फिर काशी विश्वनाथ के दर्शन करें, और काल भैरव और अन्नपूर्णा माता के मंदिर भी जाएँ।
सत्रहवें दिन वाराणसी से रेल से देवघर पहुँचें, और बाबा बैद्यनाथ के दर्शन करें। सावन में यहाँ बहुत भीड़ होती है, इसलिए उस समय एक दिन अतिरिक्त रखें।
दिन 18 से 21: मल्लिकार्जुन और रामेश्वरम
अठारहवें दिन देवघर, पटना या रांची से हैदराबाद पहुँचें। उन्नीसवें दिन नल्लमला के जंगलों से होकर श्रीशैलम जाएँ, और मल्लिकार्जुन और भ्रमरांबा देवी के दर्शन करें। जंगल का रास्ता रात में कुछ घंटे बंद रहता है, इसलिए दिन में ही यात्रा करें।
बीसवें दिन हैदराबाद से मदुरै पहुँचें और वहाँ से पंबन पुल पार करके रामेश्वरम जाएँ। इक्कीसवें दिन सुबह मंदिर के बाईस तीर्थों में स्नान करके रामनाथस्वामी के दर्शन करें, और फिर घर लौटें। चाहें तो मदुरै का मीनाक्षी मंदिर और धनुषकोडि भी देख लें।
यात्रा का अंत
बारहवें ज्योतिर्लिंग के दर्शन के साथ यह लंबी यात्रा पूरी होती है। परंपरा कहती है कि जो भक्त काशी से गंगा जल लेकर रामेश्वरम में चढ़ाता है, उसकी यात्रा और भी पूर्ण मानी जाती है। घर लौटकर भी रोज़ सुबह द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ करें, ताकि यह यात्रा मन में सदा बनी रहे। हर हर महादेव!