द्वारकादेवभूमि द्वारका, गुजरात
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कहाँ है
द्वारका गुजरात के पश्चिमी छोर पर, अरब सागर के किनारे बसी है, वहीं जहाँ गोमती नदी समुद्र से मिलती है। यह भारत के चार धामों में पश्चिम का धाम है, और सात मोक्षपुरियों में भी इसकी गिनती होती है। यहाँ का मुख्य मंदिर द्वारकाधीश मंदिर है, जिसे जगत मंदिर भी कहते हैं, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण राजा के रूप में पूजे जाते हैं।
मंदिर पाँच मंज़िला है और पत्थर पर बारीक नक्काशी से सजा है। उसके ऊँचे शिखर पर बावन गज़ की ध्वजा लहराती है, जो दिन में कई बार बदली जाती है। दूर समुद्र से भी यह ध्वजा दिखती है। मंदिर से छप्पन सीढ़ियाँ उतरकर गोमती घाट आता है, जहाँ यात्री स्नान करते हैं।
कथा: द्वारका कैसे बसी
कंस का अंत करने के बाद श्रीकृष्ण मथुरा में रहते थे। पर कंस का ससुर जरासंध बहुत क्रोधित था। भागवत पुराण में आता है कि उसने सत्रह बार मथुरा पर हमला किया। हर बार श्रीकृष्ण और बलराम जी ने उसे हराया, पर मथुरा के लोगों को बार-बार युद्ध झेलना पड़ता था। तब श्रीकृष्ण ने सोचा कि अपनी प्रजा को किसी सुरक्षित जगह ले जाना चाहिए।
श्रीकृष्ण पश्चिम में समुद्र के किनारे आए। कहते हैं कि समुद्र देव ने उन्हें ज़मीन दी, और देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा ने एक ही रात में सोने और रत्नों की एक सुंदर नगरी बना दी। उसके चारों ओर समुद्र था, बड़े-बड़े द्वार थे, और इसीलिए उसका नाम पड़ा द्वारका, यानी द्वारों वाली नगरी। श्रीकृष्ण अपनी योगमाया से सोते हुए मथुरावासियों को रातों-रात द्वारका ले आए।
द्वारका में श्रीकृष्ण ने बहुत वर्षों तक राज किया। यहीं रुक्मिणी जी से उनका विवाह हुआ, यहीं उनके बचपन के मित्र सुदामा उनसे मिलने आए, और यहीं से वे पांडवों की सहायता के लिए हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र गए। द्वारका धर्म, प्रेम और सुंदर राज्य की पहचान बन गई।
महाभारत के मौसल पर्व में आता है कि जब श्रीकृष्ण इस संसार से चले गए, तब अर्जुन द्वारका के लोगों को अपने साथ ले गए, और उनके जाते ही समुद्र ने पूरी द्वारका नगरी को अपने अंदर समा लिया। कहते हैं कि आज भी समुद्र के नीचे उस पुरानी नगरी की यादें छिपी हैं।
मंदिर और आसपास
परंपरा कहती है कि द्वारकाधीश का पहला मंदिर श्रीकृष्ण के परपोते वज्रनाभ ने बनवाया था। समय के साथ मंदिर कई बार बना और सँवरा। आदि शंकराचार्य ने यहाँ शारदा पीठ की स्थापना की, जो उनके चार मठों में पश्चिम का मठ है।
द्वारका से थोड़ी दूर समुद्र में बेट द्वारका नाम का एक टापू है, जहाँ नाव से जाया जाता है। कहते हैं कि वहीं श्रीकृष्ण का निवास था। शहर के बाहर रुक्मिणी जी का मंदिर है, और पास ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भी है। इसलिए द्वारका आने वाले यात्री अक्सर ये सब एक साथ देखते हैं।
दर्शन और यात्रा
द्वारका साल भर जाया जा सकता है, पर अक्टूबर से मार्च तक मौसम सबसे अच्छा रहता है। जन्माष्टमी पर यहाँ बहुत बड़ा उत्सव होता है और पूरी नगरी सज जाती है। आरती और दर्शन के समय मंदिर की वेबसाइट पर देख लें।
द्वारका का अपना रेलवे स्टेशन है, जो अहमदाबाद और राजकोट से जुड़ा है। सबसे पास के हवाई अड्डे जामनगर और पोरबंदर हैं। अहमदाबाद से सड़क का रास्ता लंबा है, पर सौराष्ट्र के गाँवों से होकर बहुत सुंदर है।
इस धाम से हम सीखते हैं कि सच्चा राजा वही है जो अपनी प्रजा की रक्षा के लिए अपना घर भी छोड़ दे, जैसे श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़ी। बोलो द्वारकाधीश की जय!