जगन्नाथ पुरीपुरी, ओडिशा
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कहाँ है
जगन्नाथ पुरी ओडिशा में बंगाल की खाड़ी के किनारे बसा है। यह भारत के चार धामों में पूर्व का धाम है। यहाँ के मंदिर में भगवान जगन्नाथ, यानी सारे जगत के नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। जगन्नाथ जी को भगवान श्रीकृष्ण का ही रूप माना जाता है।
तीनों मूर्तियाँ लकड़ी की हैं, बड़ी-बड़ी गोल आँखों वाली, और उनके हाथ-पैर पूरे नहीं हैं। संसार में शायद ही कहीं भगवान इस रूप में पूजे जाते हों। मंदिर का ऊँचा शिखर दूर से दिखता है, और उस पर लगा नील चक्र और लहराती ध्वजा पुरी की पहचान हैं।
कथा: नील माधव और राजा इंद्रद्युम्न
स्कंद पुराण में कथा है कि मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के बड़े भक्त थे। उन्होंने सुना कि पूर्व के समुद्र तट पर एक वन में भगवान नील माधव के रूप में पूजे जाते हैं। राजा ने अपने पुरोहित विद्यापति को उन्हें खोजने भेजा। विद्यापति ने देखा कि वन के सबर राजा विश्वावसु छिपकर नील माधव की पूजा करते हैं।
बहुत प्रयास के बाद जब राजा इंद्रद्युम्न वहाँ पहुँचे, तो नील माधव अंतर्धान हो चुके थे। राजा बहुत दुखी हुए और भगवान से प्रार्थना करने लगे। तब भगवान ने उन्हें सपने में कहा, "समुद्र में एक दिव्य लकड़ी, दारु, बहकर आएगी। उसी से मेरी मूर्ति बनवाना।" सचमुच कुछ दिनों बाद समुद्र तट पर एक बड़ा, सुगंधित लकड़ी का लट्ठा आ लगा।
पर उस लकड़ी पर किसी कारीगर का औज़ार नहीं चला। तब एक बूढ़े कारीगर आए, जिन्हें कई कथाएँ स्वयं विश्वकर्मा या भगवान का रूप बताती हैं। उन्होंने कहा, "मैं मूर्तियाँ बनाऊँगा, पर इक्कीस दिन तक कोई दरवाज़ा न खोले।" कई दिन तक अंदर से औज़ारों की आवाज़ आती रही। फिर एक दिन आवाज़ बंद हो गई।
रानी गुंडिचा को चिंता हुई कि कहीं बूढ़े कारीगर को कुछ हो तो नहीं गया। उनके कहने पर समय से पहले दरवाज़ा खोल दिया गया। अंदर कारीगर नहीं थे, और तीनों मूर्तियाँ अधूरी थीं, बिना पूरे हाथ-पैर के। राजा बहुत पछताए। तब भगवान ने कहा, "मैं इसी रूप में पूजा जाना चाहता हूँ। मेरे हाथ न होते हुए भी मैं सबको थाम लूँगा, और पैर न होते हुए भी हर भक्त तक पहुँचूँगा।"
रथ यात्रा और महाप्रसाद
हर साल आषाढ़ महीने में पुरी की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा निकलती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा तीन बड़े लकड़ी के रथों पर बैठकर अपनी मौसी के घर, गुंडिचा मंदिर, जाते हैं। लाखों भक्त रस्सियाँ खींचते हैं। यह अकेला ऐसा उत्सव है जब भगवान स्वयं मंदिर से बाहर आकर सबको दर्शन देते हैं।
जगन्नाथ मंदिर की रसोई बहुत बड़ी है, जहाँ मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी की आग पर महाप्रसाद बनता है। कहते हैं कि ऊपर रखे बर्तन का खाना सबसे पहले पकता है। हर कुछ वर्षों में नवकलेवर होता है, जब भगवान नई लकड़ी से बनी नई मूर्तियों में आते हैं। आदि शंकराचार्य का गोवर्धन मठ भी पुरी में ही है।
दर्शन और यात्रा
पुरी साल भर जाया जा सकता है। रथ यात्रा के दिनों में बहुत भीड़ होती है, इसलिए रहने की जगह पहले से तय कर लें। मंदिर में प्रवेश के नियम और दर्शन के समय मंदिर प्रशासन की वेबसाइट पर देख लें।
पुरी का अपना रेलवे स्टेशन है, जो देश के बड़े शहरों से जुड़ा है। सबसे पास का हवाई अड्डा भुवनेश्वर है, जहाँ से सड़क से पुरी पहुँचते हैं। पास में ही कोणार्क का सूर्य मंदिर और चिल्का झील भी देखने लायक हैं।
इस धाम से हम सीखते हैं कि भगवान को पूर्णता नहीं, प्रेम चाहिए। अधूरी मूर्तियों में भी वे पूरे मन से विराजते हैं, और हमें भी अपनी कमियों के साथ ही अपनाते हैं। जय जगन्नाथ!