बद्रीनाथचमोली, उत्तराखंड
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कहाँ है
बद्रीनाथ धाम उत्तराखंड के चमोली ज़िले में, हिमालय की गोद में, लगभग साढ़े दस हज़ार फ़ुट की ऊँचाई पर है। मंदिर अलकनंदा नदी के किनारे बना है, और उसके दोनों ओर दो पर्वत खड़े हैं, नर और नारायण। मंदिर के पीछे बर्फ़ से ढकी नीलकंठ चोटी दिखती है, जो सुबह की धूप में सोने जैसी चमकती है।
बद्रीनाथ दो सूचियों में आता है। यह भारत के चार धामों में उत्तर का धाम है, और उत्तराखंड के छोटे चार धाम में भी है। वैष्णव परंपरा के 108 दिव्य देशों में भी इसकी गिनती होती है। मंदिर में भगवान बद्रीनारायण की शालिग्राम शिला से बनी, ध्यान मुद्रा में बैठी मूर्ति है।
कथा: नर और नारायण
पुराणों में कथा है कि भगवान विष्णु ने नर और नारायण नाम के दो ऋषियों के रूप में अवतार लिया। दोनों भाइयों ने संसार के कल्याण के लिए इसी स्थान पर हज़ारों वर्षों तक कठिन तपस्या की। इसी स्थान को बदरिकाश्रम कहा गया। महाभारत के अनुसार यही नर और नारायण आगे चलकर अर्जुन और श्रीकृष्ण के रूप में जन्मे। आज भी मंदिर के दोनों ओर खड़े पर्वत इन्हीं के नाम से जाने जाते हैं।
एक और प्यारी कथा कहती है कि एक बार भगवान विष्णु यहाँ ध्यान में बैठे थे। चारों ओर कड़ाके की ठंड थी और बर्फ़ गिर रही थी। ध्यान में डूबे भगवान को इसका पता भी नहीं था। माता लक्ष्मी ने यह देखा तो उनका मन भर आया। उन्होंने बदरी, यानी बेर के पेड़ का रूप लिया और भगवान के ऊपर फैलकर उन्हें बर्फ़ और ठंड से बचाती रहीं।
बहुत समय बाद जब भगवान का ध्यान पूरा हुआ, तो उन्होंने देखा कि माता लक्ष्मी स्वयं बर्फ़ से ढकी हुई उनकी रक्षा कर रही हैं। भगवान प्रसन्न होकर बोले, "देवी, तुमने बदरी बनकर मेरी रक्षा की है, इसलिए आज से यह स्थान बदरीनाथ कहलाएगा, यानी बदरी के नाथ का स्थान।" तभी से भगवान यहाँ बद्रीनाथ कहलाते हैं।
आदि शंकराचार्य और मंदिर
परंपरा के अनुसार, एक समय ऐसा आया जब मूर्ति अलकनंदा नदी में चली गई थी। आदि शंकराचार्य जब यहाँ आए, तो उन्होंने नारद कुंड से भगवान की मूर्ति निकालकर फिर से मंदिर में स्थापित की। आज भी मंदिर के मुख्य पुजारी, जिन्हें रावल कहते हैं, उसी परंपरा से केरल के नंबूदरी ब्राह्मण होते हैं।
मंदिर के पास ही तप्त कुंड है, गर्म पानी का एक प्राकृतिक झरना। इतनी ठंड में भी उसका पानी गर्म रहता है, और यात्री दर्शन से पहले उसमें स्नान करते हैं। पास में माणा गाँव है, जहाँ व्यास गुफा है। कहते हैं कि यहीं बैठकर वेद व्यास जी ने महाभारत की कथा बोली थी और गणेश जी ने लिखी थी।
दर्शन और यात्रा
बर्फ़ के कारण मंदिर हर साल केवल अप्रैल या मई से नवंबर तक खुलता है। खुलने की तिथि बसंत पंचमी पर और बंद होने की तिथि दशहरे पर घोषित होती है। सर्दियों में भगवान की पूजा नीचे पांडुकेश्वर और जोशीमठ में होती है। कपाट खुलने और बंद होने की तिथि हर साल मंदिर समिति की वेबसाइट पर देखकर ही यात्रा तय करें।
बद्रीनाथ तक सड़क से पहुँचा जा सकता है। सबसे पास का हवाई अड्डा देहरादून का जॉली ग्रांट है, और रेलवे स्टेशन ऋषिकेश और हरिद्वार हैं। वहाँ से देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग और जोशीमठ होते हुए पहाड़ी रास्ता बद्रीनाथ तक जाता है। ऊँचाई ज़्यादा है, इसलिए गर्म कपड़े रखें और रास्ते में रुकते हुए जाएँ।
इस धाम से हम सीखते हैं कि सच्चा प्रेम बिना कहे रक्षा करता है, जैसे माता लक्ष्मी ने बदरी बनकर की। और यह भी कि तपस्या और धैर्य से ही मन भगवान तक पहुँचता है। बोलो बद्री विशाल की जय!