
रामेश्वरमरामनाथपुरम, तमिलनाडु
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में: सेतुबन्धे च रामेशम्
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कहाँ है
रामेश्वरम तमिलनाडु में समुद्र के बीच पंबन नाम के एक टापू पर बसा है। एक ओर बंगाल की खाड़ी है और दूसरी ओर हिंद महासागर की ओर फैला समुद्र। यहाँ का रामनाथस्वामी मंदिर बहुत ख़ास है, क्योंकि यह भारत के चार धामों में दक्षिण का धाम भी है और बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक भी। चार धामों में यही ऐसा धाम है जहाँ भगवान शिव पूजे जाते हैं।
मंदिर अपने लंबे-लंबे गलियारों के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें दोनों ओर पत्थर के हज़ारों खंभे हैं। इन्हें संसार के सबसे लंबे मंदिर गलियारों में गिना जाता है। मंदिर के अंदर बाईस तीर्थ, यानी पवित्र कुएँ हैं। यात्री दर्शन से पहले एक-एक करके इन सब कुओं के जल से स्नान करते हैं।
कथा: श्री राम का शिवलिंग
रामेश्वरम का अर्थ है राम के ईश्वर। तुलसीदास जी की रामचरितमानस में आता है कि लंका जाने के लिए समुद्र पर सेतु बाँधने से पहले भगवान राम ने यहीं समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना की और विधि से उसकी पूजा की। उन्होंने कहा कि जो इस शिवलिंग के दर्शन करेगा, उसे शिव जी की कृपा मिलेगी।
मंदिर की अपनी परंपरा एक और कथा कहती है। रावण को हराकर लौटते समय भगवान राम ने सोचा कि रावण एक ब्राह्मण भी था, इसलिए उसके वध के दोष को दूर करने के लिए शिव जी की पूजा करनी चाहिए। उन्होंने हनुमान जी को कैलाश से एक शिवलिंग लाने भेजा। पूजा का शुभ समय निकलने लगा, पर हनुमान जी अभी लौटे नहीं थे।
तब माता सीता ने समुद्र तट की रेत से अपने हाथों से एक शिवलिंग बनाया, और भगवान राम ने उसी की पूजा की। यही शिवलिंग रामनाथस्वामी कहलाया। थोड़ी देर बाद हनुमान जी कैलाश से शिवलिंग लेकर आए, और थोड़े उदास हुए कि पूजा उनके बिना हो गई।

भगवान राम ने हनुमान जी का मन रखा। उन्होंने उनका लाया शिवलिंग भी पास में स्थापित किया, जिसे विश्वलिंग कहते हैं, और कहा कि जो भी यहाँ आएगा, वह पहले हनुमान जी के लाए विश्वलिंग की पूजा करेगा, फिर रामनाथ की। आज भी यह परंपरा चलती है।
धनुषकोडि और राम सेतु
टापू के दूसरे छोर पर धनुषकोडि है, जहाँ ज़मीन पतली होकर समुद्र में मिल जाती है। कहते हैं कि यहीं से राम सेतु शुरू होता था, और भगवान राम ने अपने धनुष की कोटि, यानी नोक से इस जगह को चिह्नित किया था। समुद्र के किनारे अग्नि तीर्थ है, जहाँ यात्री समुद्र में स्नान करते हैं।
एक पुरानी परंपरा काशी और रामेश्वरम को जोड़ती है। भक्त काशी से गंगा जल लाकर रामेश्वरम के शिवलिंग पर चढ़ाते हैं, और रामेश्वरम के समुद्र तट की रेत ले जाकर गंगा में अर्पित करते हैं। इस तरह उत्तर से दक्षिण तक पूरी यात्रा एक हो जाती है।
दर्शन और यात्रा
रामेश्वरम साल भर जाया जा सकता है, पर अक्टूबर से अप्रैल तक मौसम सुहावना रहता है। महाशिवरात्रि पर यहाँ बड़ा उत्सव होता है। दर्शन और बाईस तीर्थों में स्नान के समय मंदिर की वेबसाइट पर देख लें।
रामेश्वरम तक रेल और सड़क दोनों से पहुँचा जा सकता है, समुद्र के ऊपर बने पंबन पुल से होकर। सबसे पास का बड़ा हवाई अड्डा मदुरै है। मदुरै का मीनाक्षी मंदिर भी इसी यात्रा में देखा जा सकता है।
इस धाम से हम सीखते हैं कि भगवान को बड़े साधन नहीं, सच्चा मन चाहिए, जैसे माता सीता की रेत से बनी पूजा स्वीकार हुई। और यह भी कि प्रभु अपने भक्त का मन कभी नहीं तोड़ते। हर हर महादेव, जय श्री राम!