
नागेश्वरद्वारका, गुजरात
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में: नागेशं दारुकावने
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कहाँ है
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात में द्वारका से कुछ किलोमीटर दूर, समुद्र के किनारे के इलाके में है। शिव पुराण के स्तोत्र में इसका स्थान दारुकावन बताया गया है, यानी दारुका का वन। नागेश्वर का अर्थ है नागों के ईश्वर, क्योंकि भगवान शिव गले में नाग धारण करते हैं।
मंदिर के बाहर भगवान शिव की ध्यान मुद्रा में बैठी एक बहुत बड़ी मूर्ति है, जो दूर से ही दिखती है। गर्भगृह थोड़ा नीचे की ओर है, जहाँ सीढ़ियाँ उतरकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं। द्वारका आने वाले यात्री द्वारकाधीश, बेट द्वारका और नागेश्वर, तीनों के दर्शन अक्सर एक ही दिन में करते हैं।
कथा: दारुक और भक्त सुप्रिय
शिव पुराण में कथा है कि पश्चिम के समुद्र के किनारे एक वन में दारुका नाम की एक राक्षसी और उसका पति दारुक रहते थे। दारुका को माता पार्वती से वरदान मिला था कि वह जहाँ चाहे, अपने वन को साथ ले जा सकती है। इस वरदान के बल पर दोनों राक्षस लोगों को सताने लगे और धर्म के कामों को रोकने लगे।
उन्हीं दिनों सुप्रिय नाम का एक वैश्य, यानी व्यापारी, नाव में अपना सामान लेकर समुद्र के रास्ते जा रहा था। सुप्रिय भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। वह हर पल "ॐ नमः शिवाय" जपता रहता था, और बिना शिव पूजा किए भोजन तक नहीं करता था।
राक्षसों ने सुप्रिय की नाव पर हमला किया और उसे उसके साथियों सहित पकड़कर अपनी नगरी के कारागार में डाल दिया। पर सुप्रिय ने कारागार में भी अपनी भक्ति नहीं छोड़ी। वह वहीं शिव का ध्यान करता, और अपने साथियों को भी शिव नाम जपना सिखाता।
जब दारुक को पता चला कि कारागार में भी शिव की पूजा हो रही है, तो वह क्रोध में भरकर तलवार लेकर सुप्रिय को मारने आया। सुप्रिय ने आँखें बंद कीं और पूरे मन से भगवान को पुकारा। उसी पल धरती से एक सुंदर मंदिर और उसमें ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ, और भगवान शिव ने स्वयं प्रकट होकर राक्षसों का नाश कर दिया।

भगवान शिव ने सुप्रिय को आशीर्वाद दिया, और उसकी प्रार्थना पर ज्योतिर्लिंग रूप में वहीं रह गए। वे नागेश्वर कहलाए, और माता पार्वती नागेश्वरी के रूप में उनके साथ विराजीं। इस तरह जो वन कभी डर का स्थान था, वह भक्ति का धाम बन गया।
मंत्र की शक्ति
इस कथा में सबसे बड़ा स्थान "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का है। सुप्रिय के पास न हथियार थे, न सेना, केवल यह पाँच अक्षरों का मंत्र और सच्ची श्रद्धा थी। इसीलिए नागेश्वर के दर्शन को डर और संकट से मुक्ति देने वाला माना जाता है, और भक्त यहाँ यही मंत्र जपते हैं।
दर्शन और यात्रा
नागेश्वर साल भर जाया जा सकता है, पर अक्टूबर से मार्च तक मौसम सबसे अच्छा रहता है। महाशिवरात्रि और सावन में यहाँ विशेष पूजा होती है। दर्शन के समय मंदिर की वेबसाइट पर देख लें।
नागेश्वर द्वारका से सड़क से थोड़ी ही दूरी पर है। द्वारका का रेलवे स्टेशन सबसे पास है, और सबसे पास के हवाई अड्डे जामनगर और पोरबंदर हैं। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भी इसी यात्रा में जोड़ा जा सकता है।
इस ज्योतिर्लिंग से हम सीखते हैं कि सबसे अँधेरी जगह में भी भगवान का नाम साथ नहीं छोड़ता। सच्चे मन से लिया गया एक मंत्र भी हर कैद से छुड़ा सकता है। ॐ नमः शिवाय!