सोमनाथप्रभास पाटन, गुजरात
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में: सौराष्ट्रे सोमनाथं च
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कहाँ है
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात के सौराष्ट्र में, अरब सागर के किनारे प्रभास पाटन में है। बारह ज्योतिर्लिंगों में इसका नाम सबसे पहले आता है। मंदिर ठीक समुद्र के किनारे खड़ा है, और उसकी दीवारों से लहरें टकराती रहती हैं। शाम की आरती के समय समुद्र की आवाज़ और घंटियों की ध्वनि एक हो जाती है।
प्रभास बहुत पुराना तीर्थ है। पास ही हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों का त्रिवेणी संगम है। थोड़ी दूर भालका तीर्थ है, जहाँ कहते हैं कि एक शिकारी का तीर लगने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने इस संसार से विदा ली थी।
कथा: चंद्रमा का श्राप
शिव पुराण में कथा है कि राजा दक्ष प्रजापति ने अपनी सत्ताईस पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से किया। ये सत्ताईस बहनें ही आकाश के सत्ताईस नक्षत्र हैं। पर चंद्रमा इन सबमें से केवल रोहिणी से अधिक प्रेम करते थे, और बाकी बहनों पर ध्यान नहीं देते थे। दुखी होकर बाकी बहनें अपने पिता दक्ष के पास गईं।
दक्ष ने चंद्रमा को कई बार समझाया कि सबसे बराबर प्रेम करो। पर चंद्रमा नहीं माने। तब दक्ष ने क्रोध में श्राप दे दिया, "तुम्हें क्षय रोग हो जाएगा, और तुम धीरे-धीरे घटते जाओगे।" श्राप लगते ही चंद्रमा की चमक घटने लगी। चंद्रमा के घटने से पेड़-पौधे और औषधियाँ भी मुरझाने लगीं, और सारा संसार चिंता में पड़ गया।
देवता चंद्रमा को लेकर ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने कहा, "इस श्राप से केवल भगवान शिव ही बचा सकते हैं। प्रभास क्षेत्र में जाकर उनकी तपस्या करो।" चंद्रमा ने प्रभास में समुद्र के किनारे एक शिवलिंग बनाया और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए महीनों तक कठोर तप किया।
चंद्रमा की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने कहा, "दक्ष का श्राप पूरी तरह मिट नहीं सकता, पर मैं उसे बदल देता हूँ। अब तुम एक पखवाड़े घटोगे और दूसरे पखवाड़े फिर से बढ़ोगे।" इसीलिए आज भी चंद्रमा कृष्ण पक्ष में घटता है और शुक्ल पक्ष में बढ़ता है।
चंद्रमा ने हाथ जोड़कर विनती की, "प्रभु, आप सदा यहीं विराजिए।" भगवान शिव ने यह मान लिया और ज्योतिर्लिंग रूप में वहीं रह गए। चंद्रमा का एक नाम सोम है, इसलिए यह ज्योतिर्लिंग सोमनाथ, यानी सोम के नाथ, कहलाया।
बार-बार उठता मंदिर
सोमनाथ का मंदिर इतिहास में कई बार तोड़ा गया, और हर बार भक्तों ने उसे फिर से बनाया। भारत की आज़ादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसे फिर से भव्य रूप में बनाने का संकल्प लिया। नया मंदिर 1951 में तैयार हुआ, और देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उसमें प्राण प्रतिष्ठा की।
मंदिर के आँगन में बाण स्तंभ नाम का एक खंभा है। उस पर लिखा है कि यहाँ से सीधे दक्षिण की ओर दक्षिणी ध्रुव तक बीच में कोई ज़मीन नहीं है, केवल समुद्र है। यह बात सुनकर हर यात्री समुद्र की ओर देखता रह जाता है।
दर्शन और यात्रा
सोमनाथ साल भर जाया जा सकता है, पर अक्टूबर से मार्च तक मौसम सबसे अच्छा रहता है। कार्तिक पूर्णिमा पर यहाँ बड़ा मेला लगता है, और महाशिवरात्रि पर विशेष पूजा होती है। आरती और दर्शन के समय मंदिर ट्रस्ट की वेबसाइट पर देख लें।
सबसे पास का रेलवे स्टेशन वेरावल है, जो मंदिर से कुछ ही किलोमीटर दूर है। सबसे पास के हवाई अड्डे दीव और राजकोट हैं। द्वारका और नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भी इसी यात्रा में जोड़े जा सकते हैं।
इस ज्योतिर्लिंग से हम सीखते हैं कि सबके साथ बराबर प्रेम और न्याय करना चाहिए, और यह भी कि सच्ची श्रद्धा कभी नहीं टूटती। मंदिर कितनी भी बार टूटे, भक्ति फिर उसे खड़ा कर देती है। जय सोमनाथ, हर हर महादेव!