
यमुनोत्रीउत्तरकाशी, उत्तराखंड
3 मिनट
कहाँ है
यमुनोत्री उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में, हिमालय की ऊँची पहाड़ियों में, लगभग दस हज़ार फ़ुट से ज़्यादा की ऊँचाई पर है। यहीं से कुछ ऊपर कालिंद पर्वत के पास के हिमनद से यमुना नदी निकलती है। कालिंद पर्वत से निकलने के कारण यमुना जी का एक नाम कालिंदी भी है।
छोटे चार धाम की यात्रा परंपरा से यमुनोत्री से ही शुरू होती है, फिर गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ। यहाँ यमुना माता का छोटा-सा, सुंदर मंदिर है, जिसमें काले संगमरमर की उनकी मूर्ति है। मंदिर के चारों ओर ऊँची चट्टानें और बर्फ़ की चोटियाँ हैं।
कथा: सूर्य की पुत्री, यम की बहन
पुराणों के अनुसार यमुना जी सूर्य देव की पुत्री हैं, और मृत्यु के देवता यमराज उनके भाई हैं। दोनों भाई-बहन में बहुत प्रेम था। यमुना जी बार-बार अपने भाई को घर आने का न्योता देतीं, पर यमराज अपने काम में इतने व्यस्त रहते कि आ नहीं पाते।
एक दिन, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को, यमराज अचानक अपनी बहन के घर पहुँच गए। यमुना जी बहुत खुश हुईं। उन्होंने भाई का तिलक किया, उन्हें प्रेम से भोजन कराया और खूब आदर-सत्कार किया।

बहन के प्रेम से प्रसन्न होकर यमराज ने वर माँगने को कहा। यमुना जी ने कहा, "भैया, जो भाई आज के दिन अपनी बहन के घर जाए, उसका तिलक कराए, और यमुना में स्नान करे, उसे आपका डर न रहे।" यमराज ने यह वरदान दे दिया। तभी से यह दिन भाई दूज या यम द्वितीया कहलाता है।
भागवत पुराण में आता है कि सूर्य पुत्री कालिंदी ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए यमुना के किनारे तपस्या की, और श्रीकृष्ण ने उनसे विवाह किया। इसीलिए यमुना जी को श्रीकृष्ण की प्रिय माना जाता है, और वृंदावन की यमुना कृष्ण भक्ति से जुड़ी है।
सूर्य कुंड और असित मुनि
मंदिर के पास सूर्य कुंड है, गर्म पानी का एक प्राकृतिक झरना, जिसका पानी खौलता रहता है। यात्री चावल और आलू एक कपड़े में बाँधकर इस कुंड में डालते हैं, और वे कुछ ही देर में पक जाते हैं। इन्हीं को प्रसाद के रूप में घर ले जाया जाता है। पूजा से पहले पास की दिव्य शिला की पूजा होती है।
परंपरा कहती है कि यहाँ असित मुनि का आश्रम था, जो रोज़ गंगा और यमुना दोनों में स्नान करते थे। जब वे बूढ़े हो गए और गंगोत्री तक जाना कठिन हो गया, तब उनकी भक्ति से गंगा जी की एक धारा यहीं यमुनोत्री में प्रकट हो गई।
दर्शन और यात्रा
बर्फ़ के कारण मंदिर हर साल केवल अप्रैल या मई से अक्टूबर या नवंबर तक खुलता है। परंपरा से कपाट अक्षय तृतीया पर खुलते हैं और भाई दूज पर बंद होते हैं। सर्दियों में यमुना माता की डोली नीचे खरसाली गाँव ले जाई जाती है, और वहीं पूजा होती है। तिथियाँ हर साल उत्तराखंड की चार धाम यात्रा की आधिकारिक जानकारी में देखें।
मंदिर तक सड़क नहीं जाती। जानकी चट्टी से लगभग छह किलोमीटर की पैदल चढ़ाई है, जिसके लिए घोड़े और पालकी भी मिलते हैं। सबसे पास का हवाई अड्डा देहरादून और रेलवे स्टेशन ऋषिकेश और देहरादून हैं, जहाँ से बड़कोट होते हुए सड़क जानकी चट्टी तक जाती है।
इस धाम से हम सीखते हैं कि भाई-बहन का प्रेम इतना पवित्र है कि उसके आगे मृत्यु का डर भी हार जाता है। जय यमुना मैया!