
काशी विश्वनाथवाराणसी, उत्तर प्रदेश
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में: वाराणस्यां च विश्वेशम्
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कहाँ है
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेश के वाराणसी नगर में, गंगा नदी के किनारे है। वाराणसी को काशी और बनारस भी कहते हैं। यह संसार के सबसे पुराने बसे हुए नगरों में से एक माना जाता है, और सात मोक्षपुरियों में इसका नाम सबसे पवित्र है। विश्वनाथ का अर्थ है पूरे विश्व के नाथ।
गंगा यहाँ उत्तर की ओर बहती है, और उसके किनारे अस्सी घाट से लेकर दशाश्वमेध और मणिकर्णिका तक सैकड़ों घाटों की लंबी पंक्ति है। सुबह के समय घाटों पर स्नान, पूजा और मंत्रों की ध्वनि गूँजती है, और शाम को दशाश्वमेध घाट पर होने वाली गंगा आरती देखने हज़ारों लोग आते हैं।
कथा: अविमुक्त काशी
शिव पुराण में आता है कि काशी भगवान शिव की सबसे प्रिय नगरी है। उन्होंने और माता पार्वती ने इसे स्वयं बसाया, और कभी इसे छोड़कर नहीं गए। इसीलिए काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहते हैं, यानी वह स्थान जिसे भगवान ने कभी नहीं छोड़ा।
कथा कहती है कि जब प्रलय आता है और पूरा संसार जल में डूब जाता है, तब भी भगवान शिव काशी को अपने त्रिशूल पर उठाकर बचा लेते हैं। इसलिए माना जाता है कि काशी प्रलय में भी नष्ट नहीं होती, और सृष्टि के नए आरंभ में भी वहीं रहती है।

भगवान शिव यहाँ स्वयं ज्योतिर्लिंग रूप में विश्वेश्वर बनकर प्रकट हुए। शिव पुराण कहता है कि काशी में जो भी प्राणी अपना शरीर छोड़ता है, उसके कान में भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र देते हैं, और वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। इसीलिए बहुत से लोग जीवन के अंतिम दिन काशी में बिताना चाहते हैं।
काशी की रक्षा भगवान शिव के ही रूप काल भैरव करते हैं, जिन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। माता अन्नपूर्णा यहाँ सबको भोजन देती हैं। कहते हैं कि काशी में कोई भूखा नहीं सोता, क्योंकि स्वयं माँ अन्नपूर्णा यहाँ की रसोई सँभालती हैं।
मंदिर का इतिहास
काशी विश्वनाथ का मंदिर इतिहास में कई बार टूटा और बना। आज जो मंदिर है, उसे 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने बनवाया था। बाद में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने उसके शिखरों पर सोना चढ़वाया, इसलिए इसे स्वर्ण मंदिर भी कहते हैं। हाल के वर्षों में बने काशी विश्वनाथ धाम ने मंदिर को सीधे गंगा घाट से जोड़ दिया है।
दर्शन और यात्रा
काशी साल भर जाया जा सकता है, पर अक्टूबर से मार्च तक मौसम सबसे अच्छा रहता है। सावन, महाशिवरात्रि और देव दीपावली पर यहाँ बहुत बड़ा उत्सव होता है, जब घाट लाखों दीपों से जगमगा उठते हैं। मंगला आरती और विशेष दर्शन की बुकिंग मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर होती है।
वाराणसी का अपना बड़ा रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा है, और यह देश के लगभग हर बड़े शहर से जुड़ा है। गंगा में नाव से सुबह की सैर, सारनाथ, और संकट मोचन हनुमान मंदिर भी इसी यात्रा में देखे जा सकते हैं।
इस ज्योतिर्लिंग से हम सीखते हैं कि भगवान जिसे अपना मान लेते हैं, उसे कभी नहीं छोड़ते, जैसे शिव ने काशी को कभी नहीं छोड़ा। हर हर महादेव, जय बाबा विश्वनाथ!