
घृष्णेश्वरवेरुल, छत्रपति संभाजीनगर, महाराष्ट्र
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में: घुश्मेशं च शिवालये
3 मिनट
कहाँ है
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र में छत्रपति संभाजीनगर, जिसे पहले औरंगाबाद कहते थे, के पास वेरुल गाँव में है। विश्व प्रसिद्ध एलोरा की गुफाएँ यहाँ से बहुत पास हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में इसका नाम सबसे अंत में आता है। स्तोत्र में इस स्थान को शिवालय कहा गया है।
मंदिर लाल पत्थर से बना है, और उसकी दीवारों पर देवी-देवताओं की सुंदर नक्काशी है। आज जो मंदिर है, उसे अठारहवीं सदी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने बनवाया था, जिन्होंने काशी विश्वनाथ का मंदिर भी बनवाया।
कथा: घुश्मा की भक्ति
शिव पुराण में कथा है कि देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नाम के एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहते थे। दोनों धर्म से रहते थे, पर उनके कोई संतान नहीं थी। सुदेहा इस बात से बहुत दुखी रहती थीं। आख़िर उन्होंने अपने पति से कहा कि वे उनकी छोटी बहन घुश्मा से विवाह कर लें।
घुश्मा भगवान शिव की बहुत बड़ी भक्त थीं। वे रोज़ मिट्टी के एक सौ एक शिवलिंग बनातीं, उनकी पूजा करतीं, और फिर उन्हें पास के सरोवर में विसर्जित कर देतीं। भगवान की कृपा से घुश्मा को एक सुंदर पुत्र हुआ। सबके मन में खुशी छा गई।
पर धीरे-धीरे सुदेहा के मन में ईर्ष्या जागने लगी। उन्हें लगने लगा कि घर में अब सबका प्रेम घुश्मा और उसके पुत्र को ही मिलता है। जब पुत्र बड़ा हुआ और उसका विवाह हो गया, तब एक रात ईर्ष्या में अंधी होकर सुदेहा ने उसका वध कर दिया और उसे उसी सरोवर में डाल दिया।
सुबह घर में कोहराम मच गया। बहू रोने लगी, सुधर्मा दुख से टूट गए। पर घुश्मा ने रोज़ की तरह अपनी शिव पूजा नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा, "जिस भगवान ने यह पुत्र दिया था, वही उसकी रक्षा करेंगे।" उन्होंने शांत मन से एक सौ एक शिवलिंग बनाए, पूजा की, और विसर्जन के लिए सरोवर पर गईं।
जैसे ही उन्होंने शिवलिंग विसर्जित किए, उनका पुत्र सरोवर से जीवित निकल आया। उसी समय भगवान शिव प्रकट हुए। वे सुदेहा को दंड देना चाहते थे, पर घुश्मा ने हाथ जोड़कर विनती की, "प्रभु, मेरी बहन को क्षमा कर दीजिए, और आप सदा यहीं विराजिए।" भगवान घुश्मा की करुणा से और भी प्रसन्न हुए, और घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं रह गए।

क्षमा की सीख
घृष्णेश्वर की कथा केवल भक्ति की नहीं, क्षमा की भी कथा है। घुश्मा ने अपने पुत्र को खोकर भी न श्रद्धा छोड़ी, न बदले की बात सोची। जिसने इतना बड़ा दुख दिया, उसके लिए भी उन्होंने क्षमा माँगी। इसीलिए यह ज्योतिर्लिंग संतान और परिवार की सुख-शांति का आशीर्वाद देने वाला माना जाता है।
दर्शन और यात्रा
घृष्णेश्वर साल भर जाया जा सकता है, पर अक्टूबर से मार्च तक मौसम सबसे अच्छा रहता है। महाशिवरात्रि पर यहाँ बड़ा उत्सव होता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार गर्भगृह में प्रवेश के कुछ नियम हैं, इसलिए दर्शन के नियम और समय मंदिर की वेबसाइट पर देख लें।
सबसे पास का शहर, हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन छत्रपति संभाजीनगर है, जहाँ से सड़क से थोड़ी ही दूरी है। एलोरा की गुफाएँ, विशेषकर कैलाश मंदिर, इसी यात्रा में देखी जा सकती हैं। भीमाशंकर और त्र्यंबकेश्वर भी महाराष्ट्र में ही हैं।
इस ज्योतिर्लिंग से हम सीखते हैं कि सबसे बड़े दुख में भी श्रद्धा और क्षमा नहीं छोड़नी चाहिए। घुश्मा की शांति और करुणा ने भगवान को भी जीत लिया। ॐ नमः शिवाय!