
वराह अवतार
3 मिनट · विष्णु जी की कहानियाँ
जय और विजय ने श्राप के कारण पहला जन्म दिति के पुत्रों के रूप में लिया: हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। हिरण्याक्ष बहुत बलवान और घमंडी था। उसने तप करके वर पाया कि कोई देवता, असुर या मनुष्य उसे न हरा सके। वर पाकर वह तीनों लोकों में किसी को भी युद्ध के लिए ललकारता घूमने लगा।
उसी समय ब्रह्मा जी ने स्वायंभुव मनु को सृष्टि बढ़ाने का काम सौंपा। मनु ने हाथ जोड़कर कहा, "पितामह, मैं अपनी प्रजा को कहाँ बसाऊँ? धरती तो प्रलय के जल में डूबी हुई है।" भागवत पुराण कहता है कि हिरण्याक्ष ने धरती को समुद्र की गहराई में, रसातल में छिपा दिया था। ब्रह्मा जी चिंता में पड़ गए और भगवान विष्णु का ध्यान करने लगे।
तभी एक अद्भुत बात हुई। ब्रह्मा जी की नाक से अँगूठे के बराबर एक नन्हा-सा वराह, यानी सूअर, निकला। ब्रह्मा जी, मनु और ऋषि देखते ही रह गए। देखते ही देखते वह नन्हा वराह बड़ा होने लगा, और कुछ ही पलों में हाथी जितना, फिर पर्वत जितना विशाल हो गया। सब समझ गए कि यह स्वयं भगवान विष्णु हैं।

भगवान वराह ने ज़ोर से गर्जना की, जिसे सुनकर ऋषि वेद मंत्रों से उनकी स्तुति करने लगे। फिर वराह भगवान ने विशाल समुद्र में छलाँग लगाई। उनके कूदने से समुद्र में ऊँची-ऊँची लहरें उठीं। वे पानी की गहराइयों में उतरते गए, अपनी नाक से धरती की गंध पहचानते हुए, जब तक कि रसातल तक नहीं पहुँच गए।
वहाँ धरती माँ, जिन्हें भूदेवी कहते हैं, डरी-सहमी पड़ी थीं। भगवान वराह ने बड़े प्रेम से उन्हें अपने दो बड़े दाँतों पर उठा लिया, जैसे कोई हाथी कमल का फूल उठाता है, और ऊपर की ओर चल पड़े। तभी रास्ते में हिरण्याक्ष अपनी गदा लिए सामने आ गया और बोला, "अरे जंगली जानवर, मेरी धरती छोड़ दे!"
भगवान वराह ने उसकी परवाह नहीं की और पहले धरती को सुरक्षित ऊपर ले गए। उन्होंने धरती को जल के ऊपर सावधानी से स्थापित किया और उसे अपनी शक्ति से स्थिर कर दिया। फिर वे हिरण्याक्ष से लड़ने लौटे। दोनों में बहुत देर तक भयंकर युद्ध हुआ, और अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का अंत कर दिया। जय का पहला श्राप पूरा हुआ।

देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए। ब्रह्मा जी और ऋषियों ने भगवान वराह की स्तुति की। फिर ब्रह्मा जी ने धरती पर पर्वत, नदियाँ, वन और देश बनाए, और मनु ने अपनी प्रजा को बसाया। आज भी पूजा में धरती को प्रणाम करते समय कहा जाता है, "समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले", यानी हे समुद्र को वस्त्र की तरह पहनने वाली धरती माँ, मेरे पैरों के स्पर्श के लिए क्षमा करना।
भगवान के दस अवतारों में वराह तीसरे अवतार हैं। मध्य प्रदेश के खजुराहो और एरण में वराह भगवान की बहुत प्राचीन, सुंदर मूर्तियाँ हैं। दक्षिण भारत में तिरुमला पर्वत पर भी भगवान वेंकटेश्वर से पहले श्री वराह स्वामी के दर्शन किए जाते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि धरती हमारी माँ है, जो हमें अन्न, जल और घर देती है। हमें उसका आदर करना चाहिए और उसे गंदा या नष्ट नहीं करना चाहिए। और जब भी कोई बड़ा संकट आए, भगवान किसी न किसी रूप में रक्षा करने आते हैं। जय वराह भगवान!