
बालक ध्रुव
4 मिनट · विष्णु जी की कहानियाँ
बहुत पहले उत्तानपाद नाम के एक राजा थे। उनकी दो रानियाँ थीं, सुनीति और सुरुचि। राजा छोटी रानी सुरुचि को ज़्यादा प्यार करते थे। सुरुचि का बेटा था उत्तम, और बड़ी रानी सुनीति का बेटा था ध्रुव। ध्रुव पाँच बरस का एक प्यारा, भोला बालक था।
एक दिन राजा उत्तानपाद सिंहासन पर बैठे थे, और उत्तम उनकी गोद में खेल रहा था। ध्रुव भी दौड़कर आया और पिता की गोद में बैठने लगा। तभी रानी सुरुचि ने उसका हाथ पकड़कर नीचे उतार दिया और कहा, "तू मेरी कोख से पैदा नहीं हुआ, इसलिए राजा की गोद और सिंहासन पर तेरा कोई हक़ नहीं। अगर बैठना है, तो भगवान की तपस्या कर और अगले जन्म में मेरा बेटा बनकर आ।" राजा चुपचाप सब देखते रहे।

ध्रुव रोते हुए अपनी माँ सुनीति के पास गया। माँ ने उसे गोद में बिठाकर आँसू पोंछे और कहा, "बेटा, किसी का बुरा मत सोचो। सुरुचि ने एक बात सच कही। अगर सच्चा सुख चाहिए, तो भगवान विष्णु की शरण में जाओ। वे सबके पिता हैं, और उनकी गोद से तुम्हें कोई नहीं उतार सकता।"
नन्हा ध्रुव उसी समय घर छोड़कर वन की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे नारद मुनि मिले। उन्होंने ध्रुव की परीक्षा ली, "बेटा, तुम तो अभी बहुत छोटे हो। तप बड़ा कठिन होता है। घर लौट जाओ।" पर ध्रुव नहीं माना। तब नारद जी ने प्रसन्न होकर उसे यमुना किनारे मधुवन जाने को कहा, और भगवान का मंत्र सिखाया: "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।"

मधुवन पहुँचकर ध्रुव ने तप शुरू किया। पहले महीने वह तीन दिन में एक बार फल खाता, दूसरे महीने छह दिन में एक बार पत्ते, तीसरे महीने नौ दिन में एक बार केवल पानी, और चौथे महीने बारह दिन में एक बार केवल हवा। पाँचवें महीने वह साँस रोककर एक पैर पर खड़ा हो गया, और मन में केवल भगवान का ध्यान रहा।
ध्रुव के तप से सारे संसार की साँस रुकने लगी। धरती डगमगाने लगी। घबराए देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान ने मुस्कुराकर कहा, "डरो मत, मैं अपने बालक भक्त के पास जा रहा हूँ।" भगवान गरुड़ पर बैठकर मधुवन पहुँचे। ध्रुव ध्यान में इतना डूबा था कि उसे पता ही नहीं चला। जब भगवान ने उसके मन से अपना रूप हटा लिया, तब घबराकर ध्रुव ने आँखें खोलीं, और सामने वही भगवान खड़े थे!
ध्रुव भगवान के चरणों में गिर पड़ा। वह स्तुति करना चाहता था, पर छोटा था, शब्द नहीं आ रहे थे। भगवान ने अपने शंख से प्यार से उसके गाल को छुआ, और उसी पल ध्रुव के मुख से सुंदर स्तुति निकलने लगी। भगवान ने कहा, "ध्रुव, तुम धरती पर बरसों राज करोगे, और फिर तुम्हें आकाश में ऐसा स्थान मिलेगा जो कभी नहीं हिलेगा। सारे तारे और ऋषि उसकी परिक्रमा करेंगे।"
ध्रुव घर लौटा। राजा उत्तानपाद को अपनी भूल पर बहुत पछतावा हुआ, और उन्होंने ध्रुव को गले लगाकर राजा बना दिया। ध्रुव ने बरसों न्याय से राज किया। फिर भगवान के वचन के अनुसार उसे आकाश में अटल स्थान मिला। आज भी उत्तर दिशा में जो तारा कभी अपनी जगह नहीं बदलता, उसे ध्रुव तारा कहते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि उम्र छोटी हो, पर संकल्प बड़ा हो, तो भगवान भी दौड़े चले आते हैं। ध्रुव ने अपमान का बदला लेने के बजाय भगवान की राह चुनी। और जैसे ध्रुव तारा अटल है, वैसे ही हमें भी अपने अच्छे निश्चय पर अटल रहना चाहिए। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय!