
वामन अवतार और राजा बलि
4 मिनट · विष्णु जी की कहानियाँ
भक्त प्रह्लाद के पोते का नाम था बलि। बलि असुरों के राजा थे, पर बहुत दानी, सच्चे और धर्म को मानने वाले थे। उन्होंने अपने गुरु शुक्राचार्य की सहायता से इतनी शक्ति पाई कि इंद्र को हराकर स्वर्ग जीत लिया। देवता फिर से बेघर हो गए। देवताओं की माता अदिति बहुत दुखी हुईं, और उन्होंने भगवान विष्णु की आराधना के लिए पयोव्रत रखा।
भगवान अदिति के व्रत से प्रसन्न हुए और बोले, "माता, मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूँगा और देवताओं का दुख दूर करूँगा।" भाद्रपद महीने की शुक्ल द्वादशी को अदिति और ऋषि कश्यप के घर एक नन्हे, तेजस्वी बालक ने जन्म लिया। वे बौने ब्राह्मण बालक थे, इसलिए उन्हें वामन कहा गया। उनके जनेऊ संस्कार में सूर्य ने गायत्री दी, बृहस्पति ने जनेऊ, और धरती माँ ने मृगछाला।
उन्हीं दिनों राजा बलि नर्मदा नदी के किनारे एक बहुत बड़ा अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ में जो भी जो माँगता, बलि उसे खुले मन से देते। तभी हाथ में छाता और कमंडल लिए, नन्हे वामन यज्ञशाला में पहुँचे। उनके तेज से सारी यज्ञशाला जगमगा उठी। बलि ने आदर से उनके पैर धोए और कहा, "हे ब्राह्मण देव, जो चाहो माँग लो। धन, गाएँ, गाँव, राज्य, कुछ भी।"
वामन मुस्कुराए और बोले, "राजन, मुझे इतना कुछ नहीं चाहिए। बस अपने पैरों से तीन पग धरती दे दो।" बलि हँस पड़े, "बस तीन पग? इतने छोटे पैरों से कितनी धरती नापोगे? और माँग लो।" पर वामन ने कहा, "जो संतोषी है, उसके लिए तीन पग ही बहुत हैं।"

गुरु शुक्राचार्य ने बलि को चुपके से रोका, "राजन, यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं भगवान विष्णु हैं। ये तुम्हारा सब कुछ ले लेंगे। वचन मत दो।" बलि ने विनम्रता से कहा, "गुरुदेव, अगर स्वयं भगवान मेरे द्वार पर माँगने आए हैं, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा? मैं दिया हुआ वचन नहीं तोड़ूँगा।" और बलि ने कमंडल से जल लेकर तीन पग धरती दान का संकल्प कर दिया।
संकल्प का जल गिरते ही वामन बढ़ने लगे। वे इतने विशाल हो गए कि उनका सिर आकाश से ऊपर चला गया। अब वे त्रिविक्रम थे। पहले पग में उन्होंने सारी धरती नाप ली, और दूसरे पग में सारा आकाश और स्वर्ग। उनका पैर ब्रह्मलोक तक पहुँचा, जहाँ ब्रह्मा जी ने उनके चरण धोए, और कहते हैं वही जल गंगा बनकर बहा।

वामन बोले, "राजन, दो पग में सब नप गया। तीसरा पग कहाँ रखूँ?" बलि ने हाथ जोड़े और सिर झुकाकर कहा, "प्रभु, तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिए।" भगवान बलि की सच्चाई और दानशीलता से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि के सिर पर प्यार से पैर रखा और उन्हें सुतल लोक का राजा बना दिया, जो स्वर्ग से भी सुंदर है। भगवान ने वचन दिया कि वे स्वयं सुतल लोक के द्वारपाल बनकर बलि की रक्षा करेंगे।
केरल में आज भी ओणम का त्योहार मनाया जाता है। लोक परंपरा कहती है कि राजा बलि, जिन्हें वहाँ महाबली कहते हैं, हर बरस अपनी प्रजा से मिलने आते हैं, और लोग फूलों की सुंदर रंगोली, पूकलम, बनाकर उनका स्वागत करते हैं। भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को वामन जयंती मनाई जाती है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि दिया हुआ वचन सबसे बड़ा धन है, जैसे बलि ने सब कुछ देकर भी वचन नहीं तोड़ा। संतोष में सुख है, और विनम्रता से माँगने वाला बड़े से बड़ा भी पा सकता है। और जो भगवान के आगे अपना अहंकार झुका देता है, भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। ॐ नमो नारायणाय!