
मत्स्य अवतार
4 मिनट · विष्णु जी की कहानियाँ
बहुत पुराने समय में द्रविड़ देश में सत्यव्रत नाम के एक धर्मात्मा राजा थे, जो भगवान विष्णु के बड़े भक्त थे। एक सुबह वे कृतमाला नदी में खड़े होकर सूर्य देव को जल चढ़ा रहे थे। उन्होंने अंजलि में जल भरा, तो उसमें एक नन्ही-सी मछली आ गई। राजा उसे वापस नदी में छोड़ने लगे, तो मछली बोल पड़ी, "राजन, मुझे नदी में मत छोड़िए। बड़ी मछलियाँ मुझे खा जाएँगी। मेरी रक्षा कीजिए।"

दयालु राजा ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया और महल ले आए। पर अगली सुबह मछली इतनी बड़ी हो गई कि कमंडल में समा नहीं रही थी। मछली बोली, "राजन, मुझे बड़ी जगह चाहिए।" राजा ने उसे एक बड़े घड़े में रखा। कुछ ही समय में वह घड़े से भी बड़ी हो गई। फिर राजा ने उसे एक तालाब में छोड़ा, फिर एक झील में, पर मछली हर बार और बड़ी हो जाती।
अंत में राजा ने उसे समुद्र में छोड़ा। तब मछली बोली, "राजन, समुद्र में बड़े-बड़े जलजीव हैं, मुझे यहाँ मत छोड़िए।" अब राजा समझ गए कि यह कोई साधारण मछली नहीं। उन्होंने हाथ जोड़कर पूछा, "आप कौन हैं? क्या आप स्वयं भगवान नारायण हैं, जो मेरी परीक्षा ले रहे हैं?"

मछली के रूप में भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले, "हाँ राजन। आज से सातवें दिन प्रलय आएगी। तीनों लोक जल में डूब जाएँगे। उस दिन तुम्हारे पास एक बड़ी नाव आएगी। तुम सारे पौधों के बीज, सब तरह के जीवों के जोड़े, और सप्तर्षियों को लेकर उस नाव में बैठ जाना। जब तेज़ हवा चलेगी, मैं इसी रूप में आऊँगा। तुम नाव को नागराज वासुकि की रस्सी से मेरे सींग से बाँध देना।"
सातवें दिन वैसा ही हुआ। आकाश में घने बादल छा गए, मूसलाधार बारिश होने लगी, और समुद्र उफ़न-उफ़नकर धरती पर चढ़ आया। चारों ओर पानी ही पानी हो गया। तभी एक बड़ी नाव आई। सत्यव्रत ने बीज, जीवों और सात ऋषियों को लेकर नाव में शरण ली। फिर वही मछली प्रकट हुई, अब इतनी विशाल कि उसका शरीर लाखों योजन लंबा था, और सिर पर एक सुनहरा सींग था।
राजा ने वासुकि नाग को रस्सी बनाकर नाव को मछली के सींग से बाँध दिया। भगवान मत्स्य उस नाव को प्रलय के तूफ़ानी समुद्र में सुरक्षित खींचते रहे। रास्ते भर भगवान ने राजा और ऋषियों को ज्ञान का उपदेश दिया, जिसे मत्स्य पुराण कहते हैं। प्रलय की लंबी रात बीती, और नाव हिमालय की एक चोटी पर जाकर ठहरी।
भागवत पुराण कहता है कि उसी समय हयग्रीव नाम का एक असुर सोते हुए ब्रह्मा जी के मुख से निकले वेद चुरा ले गया था। भगवान मत्स्य ने उस असुर का अंत किया और वेद ब्रह्मा जी को लौटा दिए। प्रलय के बाद राजा सत्यव्रत ही इस युग के मनु बने, जिन्हें वैवस्वत मनु कहते हैं, और उन्हीं से फिर से मानव जाति आगे बढ़ी।
मत्स्य भगवान के दस अवतारों में पहले अवतार हैं। चैत्र शुक्ल तृतीया को मत्स्य जयंती मनाई जाती है। गीत गोविंद में जयदेव जी ने भी लिखा है, "प्रलय पयोधि जले धृतवानसि वेदम्", यानी प्रलय के समुद्र में आपने वेदों की रक्षा की।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि छोटे से छोटे जीव पर भी दया करनी चाहिए। राजा ने एक नन्ही मछली की रक्षा की, और वही मछली सारे संसार की रक्षक बनी। जो दूसरों की रक्षा करता है, भगवान उसकी रक्षा करते हैं। ॐ नमो नारायणाय!