
उद्धव और गोपियाँ
4 मिनट · कृष्ण जी की कहानियाँ
कंस का अंत करने के बाद श्री कृष्ण मथुरा में ही रह गए। वृंदावन के सब लोग, नंद बाबा, यशोदा मैया, ग्वाल-बाल और गोपियाँ, अपने कान्हा को बहुत याद करते थे। वहाँ कोई बाँसुरी नहीं बजती थी, गायें उदास रहतीं, और यमुना का किनारा सूना लगता। मथुरा में कृष्ण भी अपने ब्रजवासियों को याद करते, पर उन्हें धर्म के काम पूरे करने थे।
कृष्ण के एक प्यारे सखा थे, उद्धव। उद्धव बहुत बड़े ज्ञानी थे और देवताओं के गुरु बृहस्पति के शिष्य थे। उन्हें अपने ज्ञान पर थोड़ा गर्व भी था। वे मानते थे कि भगवान को ज्ञान और ध्यान से पाया जाता है, प्रेम और आँसुओं से नहीं।
एक दिन कृष्ण ने उद्धव का हाथ पकड़कर कहा, "उद्धव, तुम वृंदावन जाओ। मेरे माता-पिता को सांत्वना दो, और गोपियों को मेरा यह संदेश दो। उनसे कहना कि मैं उनसे दूर नहीं हूँ, मैं हर जगह हूँ, उनके मन में भी।" कृष्ण की आँखें यह कहते हुए भीग गईं। उद्धव सोचने लगे, "भगवान होकर भी ये इतने भावुक क्यों हैं?"

उद्धव रथ पर सवार होकर वृंदावन पहुँचे। पहले वे नंद बाबा और यशोदा मैया से मिले। कृष्ण की बातें करते-करते दोनों की आँखों से आँसू बहते रहे, और सारी रात बीत गई। सुबह जब उद्धव यमुना किनारे गए, तो गोपियों ने उनका रथ देखा। उन्हें लगा कि शायद कान्हा लौट आए हैं, और वे दौड़ी चली आईं।
उद्धव ने बड़े ज्ञान भरे शब्दों में समझाया, "हे गोपियो, कृष्ण तो परमात्मा हैं। वे हर जगह हैं। तुम आँखें बंद करके ध्यान लगाओ, तो उन्हें अपने भीतर ही पा लोगी। रोने की ज़रूरत नहीं।" गोपियों ने चुपचाप सुना। फिर एक गोपी बोली, "उद्धव जी, आपकी बातें बहुत ऊँची हैं, पर हमारा मन तो एक ही है, और वह कान्हा के साथ चला गया। अब ध्यान लगाने के लिए दूसरा मन कहाँ से लाएँ?"
तभी एक भौंरा उड़ता हुआ एक गोपी के पास आया। गोपी ने उसी भौंरे से बातें करनी शुरू कर दीं, मानो वह कृष्ण का दूत हो। "अरे भौंरे, तू भी उसी काले रंग का है, जैसे हमारा कान्हा। तू भी फूल-फूल पर जाता है, वैसे ही वह भी हमें छोड़कर चला गया।" यह प्रसंग "भ्रमर गीत" कहलाता है। आगे चलकर संत सूरदास जी ने इस पर बहुत सुंदर पद लिखे।
गोपियाँ कभी हँसतीं, कभी रोतीं, कभी कान्हा की बचपन की बातें सुनातीं। उनके हर शब्द में, हर साँस में बस कृष्ण थे। उद्धव ने देखा कि इन भोली गोपियों ने न कोई शास्त्र पढ़ा, न कोई योग सीखा, फिर भी उनका मन हर पल भगवान में डूबा है। जो ध्यान बड़े-बड़े योगी बरसों में नहीं लगा पाते, वह गोपियों के प्रेम में अपने आप लगा था।

उद्धव का ज्ञान का घमंड पिघल गया। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने ब्रज की धूल अपने माथे पर लगाई और कहा, "धन्य हैं ये गोपियाँ! मेरी बस यही इच्छा है कि अगले जन्म में मैं वृंदावन की कोई लता या घास बनूँ, ताकि इन गोपियों के चरणों की धूल मुझ पर पड़ती रहे।" भागवत पुराण में उद्धव की यह प्रार्थना आज भी लिखी है।
कई महीने वृंदावन में रहकर उद्धव मथुरा लौटे। कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा, "उद्धव, गोपियों को ज्ञान सिखा आए?" उद्धव ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, मैं सिखाने गया था, पर ख़ुद सीखकर लौटा हूँ। आपने मुझे ज्ञान से बड़ा प्रेम दिखाने के लिए ही भेजा था।" कृष्ण मुस्कुरा दिए।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि भगवान तक पहुँचने का सबसे सीधा रास्ता सच्चा प्रेम है। ज्ञान अच्छा है, पर उसका घमंड नहीं होना चाहिए। एक सरल, प्रेम भरा मन बड़े-बड़े ग्रंथों से भी ऊपर है। राधे राधे! जय श्री कृष्ण!