
कृष्ण और सुदामा
4 मिनट · कृष्ण जी की कहानियाँ
बचपन में श्री कृष्ण और बलराम उज्जैन में संदीपनि मुनि के आश्रम में पढ़ने गए थे। वहीं कृष्ण की दोस्ती एक गरीब ब्राह्मण बालक से हुई, जिसका नाम था सुदामा। दोनों साथ पढ़ते, साथ खेलते, और गुरु जी के लिए जंगल से साथ-साथ लकड़ियाँ लाते। पढ़ाई पूरी होने पर कृष्ण द्वारका के राजा बन गए, और सुदामा अपने गाँव लौट गए।
सुदामा बहुत ज्ञानी और संतोषी थे, पर बहुत गरीब थे। घर में कई बार खाने को कुछ नहीं होता। उनकी पत्नी सुशीला बहुत समझदार थीं। एक दिन उन्होंने कहा, "स्वामी, आप कहते हैं कि द्वारका के राजा कृष्ण आपके बचपन के मित्र हैं। एक बार उनसे मिल आइए। मित्र से मिलने में संकोच कैसा?" सुदामा ने कहा, "मैं उनसे कुछ माँगने नहीं जाऊँगा। पर हाँ, अपने मित्र को देखने का मन तो बहुत करता है।"
पर मित्र के घर ख़ाली हाथ कैसे जाएँ? घर में देने को कुछ नहीं था। सुशीला पड़ोसियों से चार मुट्ठी पोहा, यानी चिवड़ा, माँग लाईं और एक पुराने कपड़े में बाँधकर सुदामा को दे दिया। सुदामा ने वह पोटली बगल में दबाई, हाथ में लाठी ली, और नंगे पैर द्वारका की लंबी यात्रा पर निकल पड़े।

कई दिन चलकर, थके-माँदे, फटे कपड़ों में सुदामा द्वारका पहुँचे। सोने के महल देखकर वे झिझक गए। उन्होंने द्वारपाल से कहा, "कृष्ण से कहना, उनका बचपन का मित्र सुदामा आया है।" द्वारपाल ने जाकर ख़बर दी। जैसे ही कृष्ण ने सुदामा का नाम सुना, वे अपना सिंहासन छोड़कर नंगे पैर दौड़ पड़े, और दरवाज़े पर पहुँचकर सुदामा को कसकर गले लगा लिया।
कृष्ण सुदामा को महल में ले आए और अपने सिंहासन पर बिठाया। फिर उन्होंने एक परात में पानी मँगाया और स्वयं सुदामा के थके, धूल भरे पैर धोने लगे। कहते हैं कि मित्र की हालत देखकर कृष्ण की आँखों से इतने आँसू बहे कि परात के पानी की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। रानी रुक्मिणी स्वयं सुदामा को पंखा झलने लगीं। सारा महल यह देखकर हैरान था कि राजा एक गरीब ब्राह्मण की ऐसी सेवा कर रहे हैं।
फिर दोनों मित्र बैठकर बचपन की बातें करने लगे। कृष्ण ने याद दिलाया, "सुदामा, याद है, एक बार हम गुरु माँ के लिए लकड़ी लेने गए थे, और जंगल में तूफ़ान आ गया था? सारी रात हम एक पेड़ के नीचे भीगते रहे थे।" फिर कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा, "भाभी ने मेरे लिए कुछ भेजा है न? छिपा क्यों रहे हो?"
सुदामा शर्म से पोटली छिपा रहे थे। राजा के महल में इतना साधारण चिवड़ा कैसे दें? कृष्ण ने प्यार से पोटली खींच ली और एक मुट्ठी चिवड़ा खाकर बोले, "अहा, इतना स्वादिष्ट भोजन मैंने कभी नहीं खाया!" जैसे ही वे दूसरी मुट्ठी उठाने लगे, रुक्मिणी जी ने उनका हाथ थाम लिया, क्योंकि वे जानती थीं कि उस एक मुट्ठी से ही भगवान सुदामा को सब कुछ दे चुके हैं।
सुदामा कुछ दिन द्वारका रहे, पर कुछ माँगा नहीं। लौटते समय वे सोच रहे थे, "मेरे मित्र ने मुझे कितना प्यार दिया। अच्छा हुआ मैंने कुछ नहीं माँगा।" पर जब वे अपने गाँव पहुँचे, तो अपनी झोंपड़ी ढूँढते रह गए। उसकी जगह एक सुंदर महल खड़ा था! उनकी पत्नी सुंदर वस्त्रों में दीपक लेकर उनका स्वागत करने आईं, और बच्चे दौड़कर उनसे लिपट गए।

सुदामा की आँखें भर आईं। वे समझ गए कि यह सब उनके मित्र की कृपा है, जिसने बिना माँगे ही सब कुछ दे दिया। पर इतना धन पाकर भी सुदामा का मन नहीं बदला। वे पहले जैसे ही सरल और भक्ति वाले बने रहे, और जीवन भर कृष्ण का नाम लेते रहे।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्ची दोस्ती में अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता। भगवान को हमारी भेंट का मोल नहीं, उसमें छिपा प्रेम चाहिए। और जो बिना माँगे सच्चे मन से मिलता है, उसे भगवान बिना माँगे सब देते हैं। जय श्री कृष्ण!