
सूरज को फल समझना
4 मिनट · हनुमान जी की कहानियाँ
बाल हनुमान बहुत छोटे थे, पर पवन देव के आशीर्वाद से उनमें बहुत बल था। एक सुबह माता अंजना फल लेने वन में गई थीं, और नन्हे हनुमान को ज़ोर की भूख लगी। उन्होंने इधर-उधर देखा, तो पूरब की ओर आकाश में लाल-लाल, गोल-गोल सूरज उग रहा था। हनुमान जी ने सोचा, "अरे, यह तो बहुत बड़ा, पका हुआ मीठा फल है!"
बस फिर क्या था। नन्हे हनुमान ने ज़मीन से छलाँग लगाई और आकाश में उड़ चले। वे बादलों को पार करते गए, ऊपर और ऊपर। पवन देव ने देखा कि उनका पुत्र सूरज की ओर जा रहा है, तो उन्हें चिंता हुई कि कहीं सूरज की गर्मी उसे जला न दे। इसलिए पवन देव ठंडी हवा बनकर उनके साथ-साथ चलने लगे।
सूर्य देव ने भी इस नन्हे बालक को आते देखा। वे जानते थे कि यह बालक आगे चलकर भगवान राम का सबसे बड़ा सेवक बनेगा, इसलिए उन्होंने अपनी गर्मी कम कर ली और उसे जलने नहीं दिया। हनुमान चालीसा में आता है, "जुग सहस्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू", यानी हज़ारों योजन दूर सूरज को उन्होंने मीठा फल समझकर निगलना चाहा।
उस दिन राहु सूर्य को ग्रहण लगाने आया था। उसने देखा कि एक नन्हा वानर उससे पहले सूरज के पास पहुँच गया है। राहु घबराकर देवराज इंद्र के पास गया और बोला, "देवराज, आपने सूरज को मेरा भोजन बनाया था, पर कोई और उसे पकड़ने जा रहा है!" इंद्र अपने सफ़ेद हाथी ऐरावत पर बैठकर देखने निकले।
इधर हनुमान जी ने राहु को देखा, तो उसे भी कोई फल समझकर उसकी ओर लपके। राहु डरकर भागा। फिर हनुमान जी की नज़र ऐरावत पर पड़ी, और वे उस बड़े सफ़ेद हाथी को भी पकड़ने दौड़े। इंद्र को लगा कि यह बालक तो सबके लिए संकट बन रहा है। उन्होंने अपना वज्र चला दिया। वज्र नन्हे हनुमान की ठोड़ी पर लगा, और वे अचेत होकर एक पर्वत पर गिर पड़े।
संस्कृत में ठोड़ी को हनु कहते हैं। वज्र से उनकी हनु पर चोट लगी थी, इसलिए तभी से उनका नाम हनुमान पड़ गया।

अपने पुत्र को अचेत देखकर पवन देव को बहुत दुख और क्रोध हुआ। वे बालक को गोद में उठाकर एक गुफा में चले गए, और उन्होंने बहना बंद कर दिया। पूरे संसार में हवा रुक गई। मनुष्य, पशु, पक्षी, देवता, सबकी साँस घुटने लगी। पेड़-पौधे मुरझाने लगे। सब घबराकर ब्रह्मा जी के पास पहुँचे।
ब्रह्मा जी सब देवताओं को लेकर उस गुफा में आए। उन्होंने प्रेम से बालक को छुआ, और नन्हे हनुमान ने आँखें खोल दीं। पुत्र को ठीक देखकर पवन देव का क्रोध शांत हुआ और संसार में फिर से हवा बहने लगी। ब्रह्मा जी ने देवताओं से कहा, "यह बालक आगे चलकर बहुत बड़े काम करेगा। आप सब इसे वरदान दीजिए।"

इंद्र ने अपने गले की कमल की माला पहनाकर कहा, "मेरा वज्र इसे कभी हानि नहीं पहुँचाएगा, और इसका नाम हनुमान होगा।" सूर्य देव ने अपने तेज का सौवाँ भाग दिया और कहा, "जब यह बड़ा होगा, मैं इसे सारे शास्त्र पढ़ाऊँगा।" वरुण देव ने कहा कि जल इसे कभी नहीं डुबो पाएगा। यमराज ने कहा कि यह सदा स्वस्थ रहेगा। कुबेर, विश्वकर्मा और शिव जी ने भी वरदान दिए कि उनके कोई भी अस्त्र इसे हानि नहीं पहुँचा पाएँगे।
अंत में ब्रह्मा जी ने कहा, "इसे कोई अस्त्र नहीं मार सकेगा, यह जब चाहेगा तब अपना रूप छोटा या बड़ा कर सकेगा, और जहाँ चाहेगा वहाँ जा सकेगा।" इस तरह सब देवताओं के आशीर्वाद से नन्हे हनुमान और भी बलवान हो गए।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि बच्चों की जिज्ञासा और साहस बहुत बड़ी चीज़ है, और यह भी कि जो दूसरों की भलाई के लिए बना हो, उसकी रक्षा पूरी सृष्टि करती है। बोलो बजरंगबली की जय!