
ऋषियों का श्राप, भूली हुई शक्ति
4 मिनट · हनुमान जी की कहानियाँ
देवताओं के वरदानों के बाद बाल हनुमान और भी बलवान हो गए थे। कोई अस्त्र उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकता था, वे पल में बड़े या छोटे हो सकते थे, और पलक झपकते कहीं भी पहुँच सकते थे। पर वे अभी बच्चे ही थे, और बच्चों की तरह बहुत चंचल और नटखट थे।
उनके घर के पास के वनों में बहुत से ऋषियों के आश्रम थे। ऋषि वहाँ शांति से तप करते, यज्ञ करते और वेद पढ़ते थे। नन्हे हनुमान खेल-खेल में आश्रमों में पहुँच जाते। कभी किसी ऋषि का कमंडल उठाकर पेड़ पर चढ़ जाते, कभी यज्ञ के लिए रखी लकड़ियाँ बिखेर देते, कभी पेड़ की छाल से बने वस्त्र खींच लेते, तो कभी ध्यान में बैठे ऋषि की दाढ़ी से खेलने लगते।
ऋषि जानते थे कि यह बालक देवताओं का आशीर्वाद पाया हुआ है, इसलिए वे बहुत दिनों तक चुपचाप सहते रहे। माता अंजना और केसरी जी ने भी हनुमान जी को बहुत समझाया, पर बालक का खेल नहीं रुका। धीरे-धीरे आश्रमों का पूजा-पाठ और तप बार-बार भंग होने लगा।
एक दिन भृगु और अंगिरा ऋषियों के वंश के ऋषि आपस में बैठकर सोचने लगे। उन्होंने कहा, "यह बालक बुरा नहीं है, बस इसे अपने बल का पता है और यह उसे खेल में लगा रहा है। जब तक इसे अपने बल का ध्यान रहेगा, यह शांत नहीं बैठेगा।"
तब ऋषियों ने हनुमान जी से कहा, "हे बालक, जिस बल के भरोसे तुम हमें सताते हो, वह बल तुम लंबे समय तक भूल जाओगे। जब कोई तुम्हें तुम्हारी शक्ति की याद दिलाएगा, तभी तुम्हें फिर से उसका ध्यान आएगा।" यह श्राप भी एक तरह का आशीर्वाद था, ताकि इतना बड़ा बल सही समय पर, सही काम में लगे।

श्राप लगते ही हनुमान जी बिल्कुल शांत और विनम्र हो गए। उन्हें अपनी भूल समझ आई, और उन्होंने हाथ जोड़कर ऋषियों से क्षमा माँगी। अब वे आश्रमों में खेलने नहीं, बल्कि ऋषियों की सेवा करने जाने लगे। वे उनके लिए फल लाते, लकड़ियाँ इकट्ठी करते, और उनकी बातें ध्यान से सुनते।
अब हनुमान जी के मन में पढ़ने की लगन जागी। माता अंजना ने कहा, "बेटा, सूर्य देव ने तुम्हें शास्त्र पढ़ाने का वचन दिया था। उनसे बड़ा गुरु कौन होगा?" हनुमान जी सूर्य देव के पास पहुँचे और बोले, "गुरुदेव, मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।"
सूर्य देव मुस्कुराए और बोले, "पुत्र, मैं तो एक पल भी नहीं रुकता। मेरा रथ दिन भर आकाश में चलता रहता है। मैं तुम्हें कैसे पढ़ाऊँ?" हनुमान जी ने कहा, "आप चलते रहिए, गुरुदेव। मैं आपके सामने मुँह करके उल्टा उड़ता रहूँगा और साथ-साथ पढ़ता रहूँगा।"

वाल्मीकि रामायण में आता है कि हनुमान जी उदयाचल से अस्ताचल तक, यानी पूरब के पर्वत से पश्चिम के पर्वत तक, सूर्य देव के सामने मुँह करके चलते हुए व्याकरण और सारे शास्त्र पढ़ते रहे। बहुत जल्दी वे वेदों, व्याकरण और सारे ज्ञान में निपुण हो गए। कहते हैं कि उनके जैसा व्याकरण जानने वाला कोई और नहीं था।
पढ़ाई पूरी होने पर हनुमान जी ने गुरुदक्षिणा पूछी। सूर्य देव ने कहा, "मेरा पुत्र सुग्रीव किष्किंधा में रहता है। तुम सदा उसके मित्र और मंत्री बनकर उसकी रक्षा करना।" हनुमान जी ने यह वचन दिया। यही वचन आगे चलकर उन्हें भगवान राम तक ले गया।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि बल के साथ विनम्रता और ज्ञान भी ज़रूरी है। हनुमान जी अपनी शक्ति भूल गए, पर उन्होंने सेवा, विनय और विद्या नहीं छोड़ी। इसीलिए जब सही समय आया, तो उनकी शक्ति भी लौटी और सबसे बड़े काम में लगी।