
द्रौपदी की पुकार
4 मिनट · कृष्ण जी की कहानियाँ
एक कथा कहती है कि एक बार श्री कृष्ण की उँगली कट गई और ख़ून बहने लगा। सब पट्टी ढूँढने दौड़े, पर द्रौपदी ने बिना एक पल सोचे अपनी क़ीमती साड़ी का एक कोना फाड़ा और कृष्ण की उँगली पर बाँध दिया। कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, "बहन, इस धागे का कर्ज़ मैं ज़रूर चुकाऊँगा।" यह लोक कथा है, पर आगे जो हुआ, वह महाभारत में लिखा है।
पांडवों ने इंद्रप्रस्थ में एक सुंदर नगरी बसाई थी, और युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करके बड़ा मान पाया था। यह देखकर दुर्योधन को बहुत जलन हुई। उसके मामा शकुनि ने एक चाल चली। उन्होंने कहा, "युधिष्ठिर को जुआ खेलने बुलाओ। पासे मैं फेकूँगा, और मेरे पासे कभी नहीं हारते।"
युधिष्ठिर को जुए का बुलावा मिला, और राजा होने के नाते उन्होंने उसे टालना ठीक नहीं समझा। हस्तिनापुर की बड़ी सभा में खेल शुरू हुआ। शकुनि की चाल से युधिष्ठिर एक-एक करके सब हारते गए: धन, सोना, सेना, राज्य, फिर अपने भाई, फिर स्वयं को। और अंत में दुर्योधन ने कहा, "अब द्रौपदी को दाँव पर लगाओ।" युधिष्ठिर ने वह दाँव भी लगाया, और हार गए।

दुर्योधन के भाई दुःशासन ने द्रौपदी को उनकी इच्छा के विरुद्ध ज़बरदस्ती सभा में ला खड़ा किया। द्रौपदी ने सभा से पूछा, "जो राजा पहले ख़ुद को हार चुका, उसे मुझे दाँव पर लगाने का अधिकार कैसे था?" पर कोई उत्तर नहीं आया। भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, सब सिर झुकाए बैठे रहे। केवल दुर्योधन के छोटे भाई विकर्ण और विदुर जी ने कहा कि यह अधर्म है, पर उनकी किसी ने नहीं सुनी।
फिर दुर्योधन ने द्रौपदी का और अपमान करने के लिए दुःशासन से कहा कि वह भरी सभा में उनकी साड़ी खींचे। दुःशासन साड़ी खींचने लगा। द्रौपदी ने पहले अपने पतियों की ओर देखा, फिर सभा के बड़ों की ओर, पर हर तरफ़ सन्नाटा था। तब उन्होंने सारी उम्मीद छोड़कर दोनों हाथ ऊपर उठाए, आँखें बंद कीं और पूरे मन से पुकारा, "हे गोविंद! हे द्वारकाधीश! हे कृष्ण! मेरी लाज बचाओ!"
उसी पल एक चमत्कार हुआ। दुःशासन साड़ी खींचता रहा, पर साड़ी ख़त्म ही नहीं हुई। जितनी साड़ी वह खींचता, उतनी ही नई साड़ी द्रौपदी के शरीर पर आ जाती। सभा में साड़ियों का पहाड़-सा ढेर लग गया। दुःशासन थककर, पसीने से भीगकर ज़मीन पर बैठ गया, पर द्रौपदी का एक धागा भी कम नहीं हुआ।
सारी सभा काँप उठी। सब समझ गए कि यह भगवान की कृपा है। कहते हैं कि उस छोटे-से कपड़े के कोने का कर्ज़ कृष्ण ने अनगिनत साड़ियों से चुकाया। धृतराष्ट्र डर गए, उन्होंने द्रौपदी से वर माँगने को कहा, और द्रौपदी ने अपने पतियों को दासता से मुक्त करवा लिया। पर फिर दूसरे जुए में पांडवों को बारह बरस का वनवास और एक बरस का अज्ञातवास मिला।

जब पांडव काम्यक वन में थे, तो श्री कृष्ण उनसे मिलने आए। द्रौपदी ने रोते हुए सभा की सारी बात सुनाई। कृष्ण ने उनके आँसू पोंछे और वचन दिया, "द्रौपदी, जिन्होंने तुम्हें रुलाया है, उनका अधर्म उन्हें ज़रूर डुबोएगा। आकाश गिर जाए, हिमालय टूट जाए, पर मेरा वचन झूठा नहीं होगा।" और आगे चलकर कुरुक्षेत्र में धर्म की ही जीत हुई।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि जब सारे सहारे छूट जाएँ, तब भी भगवान का सहारा नहीं छूटता। सच्चे मन की एक पुकार उन तक ज़रूर पहुँचती है। और यह भी कि अन्याय होते देखकर चुप रहना भी अधर्म है, इसलिए हमें हमेशा सही के साथ खड़े होना चाहिए। जय श्री कृष्ण!