
सीता स्वयंवर
4 मिनट · राम जी की कहानियाँ
मिथिला के राजा जनक बहुत ज्ञानी और धर्मात्मा राजा थे। एक बार यज्ञ के लिए वे हल से धरती जोत रहे थे, तभी हल की नोक एक संदूक से टकराई। उसमें एक सुंदर, तेजस्वी बच्ची थी। धरती से मिली थीं, इसलिए उन्हें भूमिजा कहा गया, और हल की रेखा को सीता कहते हैं, इसलिए उनका नाम पड़ा सीता। राजा जनक ने उन्हें अपनी बेटी की तरह पाला, इसलिए वे जानकी भी कहलाईं।
राजा जनक के पास भगवान शिव का एक विशाल धनुष था, जिसे पिनाक कहते थे। वह इतना भारी था कि उसे लोहे के संदूक में रखकर आठ पहियों वाली गाड़ी पर सैकड़ों लोग खींचकर लाते थे। जब सीता बड़ी हुईं, तो राजा जनक ने प्रण किया, "जो वीर इस धनुष पर डोरी चढ़ा देगा, उसी से मैं अपनी बेटी का विवाह करूँगा।" बहुत से राजा आए, पर कोई धनुष को हिला भी नहीं सका।
उसी समय महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर मिथिला पहुँचे। राजा जनक ने उनका बड़ा आदर किया। गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस में एक बहुत सुंदर प्रसंग आता है। अगली सुबह राम और लक्ष्मण गुरु की पूजा के लिए फूल चुनने राजा जनक की पुष्प वाटिका में गए। उसी समय सीता जी अपनी सखियों के साथ माँ गौरी की पूजा करने उसी बगीचे के मंदिर में आई थीं।

फूलों के बीच से सीता जी ने पहली बार राम को देखा, और राम ने सीता को। दोनों का मन एक-दूसरे में बस गया। सीता जी ने माँ गौरी से प्रार्थना की, "माँ, मुझे यही वर मिलें।" माँ गौरी की मूर्ति मुस्कुराई, और उसके गले से एक माला गिर पड़ी, मानो आशीर्वाद दे रही हों।
स्वयंवर का दिन आया। राजा जनक की सभा में दूर-दूर से राजा और राजकुमार आए। एक-एक करके सबने धनुष उठाने की कोशिश की। कोई पसीने से भीग गया, कोई हाँफने लगा, पर धनुष अपनी जगह से नहीं हिला। राजा जनक दुखी होकर बोले, "क्या धरती वीरों से ख़ाली हो गई? लगता है मेरी बेटी कुँवारी ही रहेगी।"
यह सुनकर लक्ष्मण को क्रोध आ गया, पर राम शांत रहे। तब विश्वामित्र जी ने कहा, "राम, उठो, और धनुष पर डोरी चढ़ाओ।" राम ने गुरु को प्रणाम किया और बड़ी सहजता से धनुष के पास गए। सारी सभा साँस रोके देख रही थी। राम ने धनुष को ऐसे उठाया, जैसे कोई फूल की माला उठाता है। फिर जैसे ही उन्होंने डोरी चढ़ाने के लिए धनुष को मोड़ा, वह बीच से टूट गया!
धनुष टूटने की ऐसी भयंकर आवाज़ हुई, जैसे बिजली कड़की हो। धरती काँप गई, और सभा में बैठे कई लोग गिर पड़े। फिर चारों ओर जय-जयकार गूँज उठी। राजा जनक की आँखों में ख़ुशी के आँसू आ गए। उन्होंने कहा, "मेरा प्रण पूरा हुआ। मेरी प्यारी बेटी सीता का विवाह श्री राम से होगा।"

सखियों के साथ सीता जी धीरे-धीरे आगे आईं, और लजाते हुए श्री राम के गले में जयमाला डाल दी। देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए। फिर अयोध्या से राजा दशरथ बारात लेकर आए, और मार्गशीर्ष महीने की शुक्ल पंचमी को राम और सीता का विवाह हुआ। उसी दिन लक्ष्मण का विवाह उर्मिला से, भरत का मांडवी से और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति से हुआ। यह दिन आज विवाह पंचमी के नाम से मनाया जाता है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्ची शक्ति विनम्रता के साथ आती है। राम ने बल का घमंड नहीं किया, गुरु की आज्ञा पाकर ही धनुष उठाया। और जो काम बड़े-बड़े ज़ोर लगाकर नहीं कर पाते, वह शांत मन और सच्चाई से सहज हो जाता है। बोलो सियावर रामचंद्र की जय!