
वनवास और भरत की पादुका
4 मिनट · राम जी की कहानियाँ
राजा दशरथ बूढ़े हो चले थे। उन्होंने तय किया कि अब श्री राम का राजतिलक करके उन्हें अयोध्या का राजा बना दिया जाए। सारी प्रजा ख़ुश थी। नगर सजाया गया, और अगले दिन राज्याभिषेक की तैयारी होने लगी। पर रानी कैकेयी की दासी मंथरा को यह अच्छा नहीं लगा। उसने कैकेयी के मन में बात भर दी कि राम राजा बने, तो भरत का कोई मान नहीं रहेगा।
बहुत पहले एक युद्ध में कैकेयी ने राजा दशरथ के प्राण बचाए थे, और राजा ने उन्हें दो वर देने का वचन दिया था। उस रात कैकेयी ने वे दो वर माँगे: पहला, भरत को राज्य मिले, और दूसरा, राम चौदह बरस के लिए वन जाएँ। राजा दशरथ यह सुनकर दुख से बेहोश हो गए। पर रघुकुल की रीत थी, "प्राण जाए पर वचन न जाए।"
जब राम को यह पता चला, तो उनके चेहरे पर ज़रा भी दुख नहीं आया। उन्होंने कहा, "पिताजी का वचन झूठा न हो, यही मेरे लिए सबसे बड़ी बात है। भरत राजा बने, मुझे ख़ुशी है।" उन्होंने राजसी वस्त्र उतारे और वल्कल यानी पेड़ की छाल के वस्त्र पहन लिए। सीता जी ने कहा, "जहाँ आप, वहीं मैं।" और लक्ष्मण बोले, "भैया, मैं भी आपकी सेवा के लिए साथ चलूँगा।"

सारी अयोध्या रोती हुई उनके पीछे-पीछे चली। राम ने सबको प्यार से समझाकर लौटाया। उनके जाने के कुछ दिन बाद राजा दशरथ ने पुत्र के वियोग में "राम, राम" कहते हुए प्राण त्याग दिए। उस समय भरत अपने नाना के घर कैकय देश में थे। उन्हें तुरंत बुलाया गया।
अयोध्या लौटकर भरत ने जब सारी बात सुनी, तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने अपनी माँ कैकेयी से कहा, "माँ, आपने यह क्या किया? मुझे ऐसा राज्य नहीं चाहिए, जो मेरे भाई का हक़ छीनकर मिले।" उन्होंने राजगद्दी पर बैठने से इनकार कर दिया और तय किया कि वे वन जाकर राम को वापस लाएँगे।
भरत अपनी माताओं, गुरु वशिष्ठ, मंत्रियों और प्रजा के साथ वन की ओर चल पड़े। चित्रकूट में उन्होंने दूर से राम की पत्तों की कुटिया देखी। भरत दौड़कर राम के चरणों में गिर पड़े और रोते हुए बोले, "भैया, अयोध्या लौट चलिए। राज्य आपका है। मैं तो आपका सेवक हूँ।" राम ने भरत को उठाकर गले लगा लिया।
राम ने भरत को प्यार से समझाया, "भरत, पिताजी का वचन पूरा करना हमारा धर्म है। मैं चौदह बरस पूरे करके ही लौटूँगा। तब तक प्रजा का ध्यान तुम रखो।" भरत ने बहुत विनती की, पर राम नहीं माने। तब भरत ने कहा, "तो भैया, अपनी पादुका यानी खड़ाऊँ मुझे दे दीजिए। ये ही अयोध्या के सिंहासन पर विराजेंगी, और मैं इनका सेवक बनकर राज्य चलाऊँगा।"

राम ने अपनी खड़ाऊँ उतारकर भरत को दे दीं। भरत ने उन्हें बड़े आदर से अपने सिर पर रखा और अयोध्या लौट चले। पर वे राजमहल में नहीं रहे। उन्होंने अयोध्या के पास नंदीग्राम में एक कुटिया बनाई, राम की तरह वल्कल पहने, ज़मीन पर सोए, और राम की खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखकर चौदह बरस तक उन्हीं के नाम से राज्य चलाया।
भरत ने कहा था, "अगर चौदह बरस पूरे होने पर पहले दिन भैया नहीं लौटे, तो मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।" ऐसा था भरत का प्रेम। इसीलिए भाइयों के प्रेम की बात आती है, तो सबसे पहले राम और भरत का नाम लिया जाता है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि वचन निभाना और त्याग करना ही सच्चा बड़प्पन है। राम ने पिता के वचन के लिए राज्य छोड़ा, और भरत ने भाई के प्रेम के लिए। जहाँ भाई-भाई में ऐसा प्रेम हो, वहाँ कोई कलह नहीं टिकती। जय श्री राम! जय भरत भैया!