
शुंभ, निशुंभ और देवी का प्रण
3 मिनट · दुर्गा जी की कहानियाँ
महिषासुर के बहुत समय बाद शुंभ और निशुंभ नाम के दो असुर भाई हुए। वे बहुत बलवान और घमंडी थे। उन्होंने इंद्र से स्वर्ग छीन लिया, सूर्य, चंद्रमा, कुबेर, यम और वरुण के अधिकार भी ले लिए, और देवताओं को निकाल दिया। तब देवताओं को माँ का वह वचन याद आया, "जब भी तुम मुझे याद करोगे, मैं आऊँगी।"
सारे देवता हिमालय पर्वत पर गए और माँ की स्तुति करने लगे। यही वह प्रसिद्ध स्तुति है जो आज भी हर नवरात्रि में गाई जाती है: "या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।" यानी, जो देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में रहती हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम। देवताओं ने माँ को हर रूप में प्रणाम किया: बुद्धि, नींद, भूख, दया, क्षमा, शांति, श्रद्धा और माँ के रूप में।
उसी समय माता पार्वती गंगा जी में स्नान करने आईं। उन्होंने देवताओं से पूछा, "आप सब किसकी स्तुति कर रहे हैं?" तभी पार्वती जी के शरीर से एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी देवी प्रकट हुईं और बोलीं, "ये मेरी ही स्तुति कर रहे हैं।" पार्वती जी के शरीर के कोश से निकलने के कारण उन्हें कौशिकी कहा गया, और वे अंबिका नाम से भी जानी गईं।

देवी अंबिका हिमालय की एक सुंदर ढलान पर अपने सिंह के साथ बैठ गईं। तभी शुंभ के दो सेवक, चंड और मुंड, उधर से निकले। उन्होंने देवी को देखा तो दौड़कर शुंभ के पास गए और बोले, "महाराज, हिमालय पर एक ऐसी देवी हैं, जिनके जैसी सुंदर और तेजस्वी स्त्री तीनों लोकों में नहीं। आपके पास संसार के सारे रत्न हैं, यह रत्न भी आपके पास होना चाहिए।"
शुंभ ने अपने चतुर दूत सुग्रीव को देवी के पास भेजा। दूत ने बड़ी मीठी बातें बनाकर कहा, "हे देवी, तीनों लोकों के स्वामी महाराज शुंभ ने संदेश भेजा है। स्वर्ग के सारे रत्न अब उनके पास हैं। आप भी उनसे या उनके भाई निशुंभ से विवाह कर लीजिए, और सारे सुख भोगिए।"
देवी मुस्कुराईं और बोलीं, "दूत, तुमने सच कहा, शुंभ और निशुंभ बहुत बलवान हैं। पर मैंने बचपन में नासमझी में एक प्रण ले लिया था। जो मुझे युद्ध में हरा दे, मेरा घमंड तोड़ दे, और बल में मेरे बराबर हो, वही मेरा पति होगा। तो जाओ, अपने राजा से कहो कि आएँ और मुझे युद्ध में जीत लें।"

दूत ने लौटकर सारी बात बताई। शुंभ आग-बबूला हो गया। उसने अपने सेनापति धूम्रलोचन को साठ हज़ार असुरों के साथ भेजा और कहा, "उस देवी को ज़बरदस्ती पकड़कर ले आओ।" धूम्रलोचन ने देवी के पास जाकर उन्हें धमकाया। देवी ने बस एक "हुं" की आवाज़ की, और धूम्रलोचन वहीं राख का ढेर बन गया। माँ के सिंह ने गर्जना करके असुर सेना को भगा दिया।
यह ख़बर सुनकर शुंभ का क्रोध और बढ़ गया। उसने अपने सबसे भयंकर सेनापतियों, चंड और मुंड, को बुलाया और कहा, "जाओ, बड़ी सेना लेकर जाओ, और उस देवी को किसी भी तरह ले आओ।" आगे क्या हुआ, वह माँ काली की कहानी में है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि घमंड से भरा मन सबको अपनी चीज़ समझने लगता है, पर सच्ची शक्ति को कोई ख़रीद नहीं सकता। और यह भी कि माँ हर प्राणी में शक्ति, बुद्धि, दया और क्षमा बनकर बसती हैं, इसलिए हर जीव का आदर करना चाहिए। जय माता दी!