
चंड, मुंड और माँ काली
4 मिनट · दुर्गा जी की कहानियाँ
शुंभ की आज्ञा पाकर चंड और मुंड एक विशाल असुर सेना लेकर हिमालय की ओर चले। उनके हाथों में धनुष, तलवारें और भाले थे। उन्होंने दूर से देखा कि देवी अंबिका एक सुनहरी चोटी पर अपने सिंह पर शांत बैठी मुस्कुरा रही हैं। असुर धनुष ताने, तलवारें उठाए, पहाड़ पर चढ़ने लगे।

असुरों को अपनी ओर आते देख देवी अंबिका के चेहरे पर क्रोध आया। उनकी भौंहें तन गईं, और उनके माथे से अचानक एक और देवी प्रकट हुईं। उनका रंग गहरा था, बाल खुले और लहराते हुए, हाथ में तलवार, और आँखों में ऐसा तेज कि असुर काँप उठे। वे थीं माँ काली। माँ काली ने ज़ोर से गर्जना की, और असुर सेना पर टूट पड़ीं।
माँ काली अपने भक्तों के लिए कोमल और अधर्मियों के लिए भयंकर हैं। उन्होंने देखते ही देखते असुरों के हाथी, घोड़े और रथ बिखेर दिए। असुरों के अस्त्र उनके सामने तिनकों की तरह टूट गए। चंड ने बाणों की बौछार की, और मुंड ने हज़ारों चक्र चलाए, पर माँ काली के सामने सब बेकार। अंत में माँ काली ने चंड और मुंड दोनों का अंत कर दिया।
फिर माँ काली प्रसन्न होकर देवी अंबिका के पास लौटीं और बोलीं, "माँ, चंड और मुंड का काम मैंने पूरा कर दिया। अब शुंभ और निशुंभ को आप स्वयं हराइए।" देवी अंबिका ने प्रेम से कहा, "तुमने चंड और मुंड को हराया है, इसलिए आज से संसार तुम्हें चामुंडा के नाम से पूजेगा।" यही कारण है कि माँ का एक नाम चामुंडा है।

यह सुनकर शुंभ और भी घबरा गया। उसने अपनी पूरी सेना भेजी। तब सारे देवताओं की शक्तियाँ भी देवी की मदद को आईं: ब्रह्मा की शक्ति ब्रह्माणी हंस पर, शिव की माहेश्वरी बैल पर, विष्णु की वैष्णवी गरुड़ पर, कार्तिकेय की कौमारी मोर पर, इंद्र की ऐंद्री हाथी पर, वराह की वाराही, और नृसिंह की नारसिंही। इन्हें मातृकाएँ कहते हैं।
असुरों में रक्तबीज नाम का एक असुर था, जिसे वर मिला था कि उसके ख़ून की जो बूँद धरती पर गिरेगी, उससे एक नया रक्तबीज पैदा हो जाएगा। जितना उस पर वार होता, उतने नए रक्तबीज बन जाते। तब देवी ने माँ काली से कहा कि उसकी एक भी बूँद धरती पर न गिरने दो। माँ काली ने अपना मुख फैला दिया, और कोई बूँद धरती तक नहीं पहुँची। इस तरह रक्तबीज का भी अंत हुआ।
अंत में निशुंभ और फिर शुंभ स्वयं युद्ध में आए। शुंभ ने कहा, "तू दूसरों की शक्ति के सहारे लड़ती है।" देवी मुस्कुराईं और बोलीं, "इस संसार में मैं ही अकेली हूँ। ये सब मेरी ही शक्तियाँ हैं।" और सारी शक्तियाँ देवी में समा गईं। फिर देवी ने अकेले ही शुंभ को हराया। देवताओं ने माँ की नारायणी स्तुति गाई, "सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।"
आज भी बंगाल में दिवाली की अमावस्या की रात माँ काली की पूजा होती है, और कोलकाता का कालीघाट मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। हिमाचल प्रदेश में चामुंडा देवी का मंदिर है, जहाँ दूर-दूर से भक्त आते हैं। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय का पाठ करते समय भक्त माँ चामुंडा को याद करते हैं, और कई घरों में "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" का जाप होता है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि माँ का रूप कितना भी भयंकर दिखे, वह केवल बुराई के लिए है, भक्तों के लिए वे सदा ममता से भरी हैं। और यह भी कि सारी अलग-अलग दिखने वाली शक्तियाँ असल में एक ही माँ के रूप हैं। जय माँ काली! जय माँ चामुंडा!