
शिव पार्वती विवाह
4 मिनट · शिव जी की कहानियाँ
सती के जाने के बाद भगवान शिव कैलाश पर गहरे ध्यान में बैठ गए। उधर सती ने पर्वतराज हिमालय और रानी मैना के घर बेटी बनकर जन्म लिया। पर्वत की बेटी होने से उनका नाम पड़ा पार्वती। बचपन से ही पार्वती को शिव जी के नाम से अनोखा प्रेम था। एक दिन नारद मुनि आए और बोले, "इस कन्या का विवाह स्वयं भगवान शंकर से होगा।"
उन्हीं दिनों तारकासुर नाम का एक असुर देवताओं को बहुत सता रहा था। उसे ब्रह्मा जी से वरदान मिला था कि उसे केवल शिव जी का पुत्र ही हरा सकेगा। पर शिव जी तो ध्यान में थे, विवाह की उन्हें क्या चिंता! देवताओं ने सोचा कि किसी तरह शिव जी का ध्यान पार्वती की ओर जाए।
पार्वती रोज़ फूल, जल और बेलपत्र लेकर ध्यानमग्न शिव जी की सेवा करने जातीं। देवताओं ने प्रेम के देवता कामदेव को भेजा। कामदेव ने वसंत ऋतु बुलाई और शिव जी पर फूलों का बाण चलाया। शिव जी का ध्यान टूटा। उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला, और कामदेव वहीं भस्म हो गए। फिर शिव जी अंतर्धान हो गए। बाद में कामदेव की पत्नी रति के रोने पर शिव जी ने वचन दिया कि कामदेव फिर से जन्म लेंगे।
पार्वती समझ गईं कि शिव जी को सुंदरता या किसी चाल से नहीं, केवल सच्ची तपस्या से पाया जा सकता है। उन्होंने राजमहल छोड़ा, सुंदर वस्त्र और गहने उतारे, और वन में जाकर कठोर तप करने लगीं। गर्मी में वे आग के बीच बैठतीं, सर्दी में बर्फ़ीले पानी में खड़ी रहतीं। पहले फल खाए, फिर केवल सूखे पत्ते, और अंत में पत्ते खाना भी छोड़ दिया। इसीलिए उनका एक नाम "अपर्णा" पड़ा, यानी जिसने पत्ते भी छोड़ दिए।

एक दिन एक युवा ब्रह्मचारी, हाथ में दंड लिए, पार्वती के पास आया। उसने आदर से पूछा, "देवी, आप इतनी कठिन तपस्या किसके लिए कर रही हैं?" पार्वती की सखी ने बताया कि वे शिव जी को पति रूप में पाना चाहती हैं। ब्रह्मचारी हँस पड़ा, "शिव? जो श्मशान में रहते हैं, शरीर पर भस्म और गले में साँप पहनते हैं, जिनका न घर है न परिवार? आप जैसी राजकुमारी उनसे विवाह करेंगी?"
पार्वती की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। उन्होंने कहा, "तुम शिव को नहीं जानते। वे सारे संसार के स्वामी हैं, सबसे बड़े दयालु हैं। जो उनकी निंदा करता है, उसकी बात सुनना भी पाप है। सखी, चलो यहाँ से।" जैसे ही पार्वती जाने को मुड़ीं, ब्रह्मचारी ने उनका हाथ थाम लिया। वह कोई और नहीं, स्वयं भगवान शिव थे! वे मुस्कुराकर बोले, "देवी, आज से मैं तुम्हारा दास हूँ। तुम्हारी तपस्या ने मुझे जीत लिया।"
फिर विवाह की तैयारी शुरू हुई। सप्तऋषि हिमालय के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर गए। शुभ दिन तय हुआ, और भगवान शिव की बारात निकली। नंदी पर सवार शिव जी, उनके साथ ब्रह्मा जी, विष्णु जी, सारे देवता, और शिव जी के अनोखे गण। कोई नाच रहा था, कोई डमरू बजा रहा था, कोई शंख। किसी के कई सिर थे, किसी का एक भी नहीं!

ऐसी बारात देखकर माता मैना घबरा गईं। उन्होंने कहा, "मैं अपनी कोमल बेटी का विवाह ऐसे दूल्हे से नहीं करूँगी!" तब नारद जी और पार्वती की प्रार्थना पर भगवान शिव ने अत्यंत सुंदर रूप धारण किया। सिर पर चंद्रमा, गले में फूलों की माला, और चेहरे पर करोड़ों सूर्यों जैसी चमक। उन्हें देखकर मैना का मन खुशी से भर गया।
फिर पूरे विधि-विधान से शिव और पार्वती का विवाह हुआ। ब्रह्मा जी ने मंत्र पढ़े, अग्नि के फेरे हुए, और देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए। कहते हैं कि यह विवाह उत्तराखंड के त्रियुगीनारायण में हुआ, जहाँ उस विवाह की अग्नि आज भी जल रही है। आगे चलकर उनके पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर को हराया।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्ची लगन और धैर्य से असंभव भी संभव हो जाता है। और यह भी कि जिससे हम प्रेम करते हैं, उसका सम्मान हर हाल में बनाए रखना चाहिए, जैसे पार्वती ने किया। बोलो उमापति महादेव की जय!