
नीलकंठ महादेव
4 मिनट · शिव जी की कहानियाँ
एक समय की बात है, देवता बहुत कमज़ोर हो गए थे और असुर उन पर भारी पड़ रहे थे। देवता भगवान विष्णु के पास गए। विष्णु जी ने कहा, "समुद्र मंथन करो। समुद्र के भीतर से अमृत निकलेगा, जिसे पीकर तुम अमर हो जाओगे। पर यह काम अकेले नहीं होगा, असुरों को भी साथ लो।" देवताओं ने असुरों से मित्रता की, और दोनों मिलकर क्षीर सागर को मथने के लिए तैयार हुए।
मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया, और नागराज वासुकि को रस्सी। पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तो भगवान विष्णु ने कच्छप यानी कछुए का रूप लेकर उसे अपनी पीठ पर थाम लिया। एक ओर देवता वासुकि की पूँछ पकड़कर खींचते, दूसरी ओर असुर उसका मुँह। इस तरह मंथन शुरू हुआ।

मंथन होता रहा, होता रहा। पर अमृत से पहले समुद्र से कुछ और निकला। काले धुएँ जैसा एक भयंकर विष, जिसे हलाहल या कालकूट कहते हैं। वह इतना तेज़ था कि उसकी गर्मी से चारों दिशाएँ जलने लगीं। पेड़ सूखने लगे, पशु-पक्षी बेचैन हो गए, और देवता और असुर दोनों डरकर पीछे हट गए। किसी के पास इसका कोई उपाय नहीं था।
तब सब मिलकर कैलाश पर्वत पहुँचे और भगवान शिव से प्रार्थना की, "हे देवों के देव महादेव, यह विष सारे संसार को नष्ट कर देगा। आप ही हमें बचा सकते हैं।" भगवान शिव ने माता पार्वती की ओर देखा और कहा, "देवी, जो दूसरों के दुख में काम आए, वही सच्चा बड़ा है। इन सबकी रक्षा करना मेरा धर्म है।" माता पार्वती ने मुस्कुराकर हाँ में सिर हिलाया, क्योंकि वे जानती थीं कि उनके स्वामी का बल कितना है।
भगवान शिव समुद्र के किनारे गए। उन्होंने सारा हलाहल अपनी हथेलियों में इकट्ठा किया और शांति से पी गए। पर उन्होंने उसे पेट तक नहीं जाने दिया, क्योंकि उनके भीतर तो सारा संसार बसा है। उन्होंने विष को अपने कंठ में ही रोक लिया। एक कथा कहती है कि माता पार्वती ने अपने हाथ से उनका कंठ थाम लिया, ताकि विष नीचे न उतरे।
विष के असर से भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया। तभी से उनका एक नाम पड़ा "नीलकंठ", यानी नीले कंठ वाले। भागवत पुराण कहता है कि पीते समय विष की कुछ बूँदें धरती पर गिर गईं। उन्हें साँपों, बिच्छुओं और कुछ ज़हरीले पौधों ने ले लिया, इसीलिए उनमें ज़हर होता है।
संसार फिर से ठंडा और शांत हो गया। देवता, असुर, ऋषि, सब भगवान शिव के चरणों में झुक गए और उनकी जय-जयकार करने लगे। इसके बाद मंथन फिर शुरू हुआ, और समुद्र से कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष, माता लक्ष्मी और अंत में धन्वंतरि अमृत का कलश लेकर निकले।

लोक परंपरा कहती है कि विष की गर्मी शांत करने के लिए देवताओं ने शिव जी पर जल चढ़ाया। इसीलिए आज भी सावन के महीने में भक्त शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाते हैं, और कांवड़ यात्री दूर-दूर से गंगाजल लाकर अभिषेक करते हैं। उत्तराखंड में ऋषिकेश के पास नीलकंठ महादेव का मंदिर इसी कथा की याद में है।
कुछ जगहों पर यह भी मान्यता है कि जिस रात भगवान शिव ने विष पिया, उस रात देवता सारी रात जागकर उनके भजन गाते रहे, ताकि विष का असर न हो। महाशिवरात्रि पर भक्तों का रात भर जागकर शिव जी का नाम लेना इसी भाव से जोड़ा जाता है। यह शास्त्र की नहीं, लोक परंपरा की बात है, पर इसमें भक्ति का सुंदर भाव है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्चा बड़ा वही है जो दूसरों का दुख अपने ऊपर ले ले। अमृत तो सब चाहते थे, पर विष पीने का साहस केवल महादेव में था। हमें भी कठिन समय में दूसरों के काम आना चाहिए। हर हर महादेव!