
माँ शाकंभरी
4 मिनट · दुर्गा जी की कहानियाँ
देवी माहात्म्य के ग्यारहवें अध्याय में माँ देवताओं को बताती हैं कि आगे चलकर वे और भी कई रूपों में आएँगी। उन्हीं में एक बहुत प्यारा रूप है माँ शाकंभरी का, यानी वह माँ जो शाक, फल और सब्ज़ियों से संसार का पेट भरती हैं। देवी भागवत पुराण में इसकी पूरी कहानी आती है।
बहुत पहले दुर्गम नाम का एक असुर था। उसने तप करके ब्रह्मा जी से चारों वेद माँग लिए। वेद छिन जाने से धरती पर यज्ञ, पूजा और मंत्र सब बंद हो गए। देवताओं को यज्ञ का भाग मिलना बंद हो गया, और धीरे-धीरे बादलों ने बरसना छोड़ दिया। सौ बरस तक धरती पर एक बूँद बारिश नहीं हुई।
नदियाँ, तालाब और कुएँ सूख गए। खेत फट गए, पेड़ों के पत्ते झड़ गए, और पशु-पक्षी प्यास से तड़पने लगे। लोग भूखे-प्यासे इधर-उधर भटकने लगे। तब ऋषि-मुनि हिमालय पर्वत पर इकट्ठा हुए और सच्चे मन से माँ जगदंबा की प्रार्थना करने लगे, "माँ, अपने बच्चों को बचाओ।"

माँ ने अपने बच्चों की पुकार सुनी। वे एक ऐसे रूप में प्रकट हुईं जिनकी अनगिनत आँखें थीं। इसीलिए उन्हें शताक्षी, यानी सौ आँखों वाली, कहा गया। अपने बच्चों का दुख देखकर माँ की उन सारी आँखों से आँसू बहने लगे। माँ लगातार नौ दिन और नौ रात रोती रहीं।
माँ की करुणा के वे आँसू धरती पर गिरकर धाराएँ बन गए। धाराओं से नदियाँ बनीं, और सूखी धरती फिर से भीग गई। तालाब भर गए, कुएँ लबालब हो गए, और जहाँ-जहाँ पानी पहुँचा, वहाँ हरी घास और पौधे उग आए। प्यासे पशु-पक्षी पानी पीने दौड़ पड़े।

पर भूख अभी बाक़ी थी। तब माँ ने अपने हाथों में फल, सब्ज़ियाँ, हरी पत्तियाँ, जड़ें और अन्न प्रकट किए, और सबको अपने हाथों से खिलाया। जब तक खेतों में नई फ़सल नहीं उगी, माँ ने किसी को भूखा नहीं रहने दिया। शाक यानी हरी सब्ज़ियों से संसार का भरण करने के कारण उनका नाम पड़ा शाकंभरी।
देवी माहात्म्य में माँ ने स्वयं यह वचन दिया है: "ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः। भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः॥" इसका अर्थ है, जब तक वर्षा नहीं होगी, तब तक मैं अपने ही शरीर से उपजी, प्राण बचाने वाली सब्ज़ियों से सारे संसार का पालन करूँगी। जैसे घर में माँ पहले सबको खिलाती है और फिर ख़ुद खाती है, वैसे ही जगत की माँ ने सबसे पहले अपने बच्चों का पेट भरा।
फिर माँ ने असुर दुर्गम से युद्ध किया और उससे वेद छीनकर ब्राह्मणों को लौटा दिए। फिर से यज्ञ होने लगे, देवताओं को उनका भाग मिला, और समय पर बारिश होने लगी। दुर्गम को हराने के कारण ही माँ का एक नाम "दुर्गा" पड़ा। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के पास और राजस्थान के सांभर में माँ शाकंभरी के प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहाँ माँ को फल और सब्ज़ियों का भोग लगता है।
पौष महीने की पूर्णिमा को शाकंभरी जयंती मनाई जाती है। उससे पहले के दिनों को शाकंभरी नवरात्रि कहते हैं। कई घरों में उस दिन माँ को तरह-तरह की हरी सब्ज़ियों और फलों का भोग लगाया जाता है, और ज़रूरतमंदों को भोजन कराया जाता है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि माँ की ममता की कोई सीमा नहीं, वे अपने बच्चों को भूखा-प्यासा नहीं देख सकतीं। हमें भी अन्न, जल और प्रकृति का आदर करना चाहिए, खाना बर्बाद नहीं करना चाहिए, और भूखे को भोजन कराना चाहिए। जय माँ शाकंभरी!