
श्री राम की दुर्गा पूजा
4 मिनट · दुर्गा जी की कहानियाँ
माता सीता का पता लग चुका था, और वानर सेना समुद्र पार लंका पहुँचने की तैयारी में थी। रावण बहुत बलवान था, और उसके पास कई वरदान थे। श्री राम के मन में चिंता थी कि इस कठिन युद्ध में जीत कैसे मिलेगी। देवी भागवत पुराण कहता है कि तभी नारद मुनि आए और बोले, "राम, शक्ति की देवी माँ दुर्गा की आराधना कीजिए। नवरात्रि का व्रत रखिए, माँ की कृपा से आपकी जीत होगी।"
बंगाल की परंपरा में यह कथा और विस्तार से आती है। वसंत ऋतु की नवरात्रि तो बीत चुकी थी, और शरद ऋतु में देवता सोए रहते हैं, यह पूजा का समय नहीं माना जाता था। फिर भी राम ने शरद ऋतु में ही माँ को जगाकर पूजा करने का निश्चय किया। इसीलिए इसे "अकाल बोधन" कहते हैं, यानी बिना समय के माँ को जगाना। आज बंगाल की दुर्गा पूजा इसी की याद में शरद ऋतु में होती है।
राम ने समुद्र किनारे माँ दुर्गा की मिट्टी की प्रतिमा बनवाई। विभीषण, जांबवान, लक्ष्मण और सारी वानर सेना पूजा की तैयारी में लग गई। पूजा के लिए एक सौ आठ नीले कमल चाहिए थे, जो बहुत दुर्लभ थे। हनुमान जी उड़कर दूर देवीदह नाम की झील पर गए और वहाँ से एक सौ आठ नीले कमल तोड़ लाए।

राम ने नौ दिन तक व्रत रखकर पूरी श्रद्धा से माँ की पूजा की। हर दिन वे माँ के अलग रूप की आराधना करते, दीप जलाते और मंत्र पढ़ते। फिर आया संधि पूजा का समय, अष्टमी और नवमी के मिलने का पवित्र पल। राम एक-एक करके माँ के चरणों में कमल चढ़ाने लगे, और हर कमल के साथ माँ का नाम लेते।
एक सौ सात कमल चढ़ चुके थे। राम ने एक सौ आठवाँ कमल उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, पर वहाँ कोई कमल नहीं था! कहते हैं कि माँ ने राम की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए स्वयं एक कमल छिपा दिया था। सब घबरा गए। पूजा अधूरी रह जाती, और इतने कम समय में नया कमल लाना संभव नहीं था।
राम ने एक पल सोचा, फिर शांति से बोले, "लोग मुझे कमलनयन कहते हैं, यानी मेरी आँखें कमल जैसी हैं। माँ की पूजा अधूरी नहीं रहेगी। मैं अपना एक नेत्र माँ के चरणों में अर्पण करूँगा।" उन्होंने अपने तरकश से एक बाण निकाला। लक्ष्मण और हनुमान जी की आँखों में आँसू आ गए, पर राम का मन अटल था।
जैसे ही राम ने बाण उठाया, माँ दुर्गा प्रतिमा से प्रकट हो गईं और उनका हाथ थाम लिया। माँ बोलीं, "राम, रुको! मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। वह कमल मैंने ही छिपाया था, तुम्हारी परीक्षा के लिए। जाओ, युद्ध में तुम्हारी जीत होगी।" माँ ने राम को विजय का आशीर्वाद दिया और अंतर्धान हो गईं। आगे चलकर दशमी के दिन राम ने रावण पर विजय पाई, और वह दिन विजयादशमी या दशहरा कहलाया।

आज भी बंगाल और देश भर में दुर्गा पूजा में संधि पूजा के समय माँ को एक सौ आठ कमल और एक सौ आठ दीप अर्पण किए जाते हैं। ढाक की आवाज़ गूँजती है, धुनुची नाच होता है, और विजयादशमी को माँ को विदा करते हुए सब कहते हैं, "आसछे बोछोर आबार होबे", यानी अगले बरस फिर आना माँ।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्ची भक्ति में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। राम भगवान होकर भी माँ के सामने एक विनम्र भक्त बनकर बैठे। बड़े काम से पहले भगवान का आशीर्वाद लेना और पूरी लगन से अपना कर्तव्य करना ही सफलता का रास्ता है। जय माँ दुर्गा! जय श्री राम!