
शबरी के बेर
4 मिनट · राम जी की कहानियाँ
बहुत पहले एक भील कबीले में शबरी नाम की एक लड़की थी। उसका मन बचपन से ही भगवान की भक्ति में लगता था। एक लोक कथा कहती है कि उसके विवाह के लिए बहुत से पशुओं की बलि दी जाने वाली थी। यह सोचकर शबरी का मन रो पड़ा, और वह रात में चुपचाप घर छोड़कर जंगल में चली गई। चलते-चलते वह मतंग ऋषि के आश्रम पहुँची।
मतंग ऋषि ने शबरी की सच्ची भक्ति देखकर उसे आश्रम में रहने दिया। शबरी रोज़ सुबह सबसे पहले उठकर आश्रम का रास्ता साफ़ करती, ऋषियों के लिए लकड़ियाँ और फल लाती, और बड़े प्रेम से सेवा करती। बरसों बीत गए, शबरी बूढ़ी हो गई। जब मतंग ऋषि ने इस संसार से जाने का समय जाना, तो उन्होंने शबरी से कहा, "बेटी, तुम यहीं रहना। एक दिन स्वयं भगवान श्री राम इस आश्रम में आएँगे। उनके दर्शन से तुम्हारा जीवन धन्य हो जाएगा।"
उस दिन से शबरी रोज़ राम की राह देखने लगी। हर सुबह वह रास्ते के काँटे बीनती, उसे झाड़ू से साफ़ करती, और उस पर फूल बिछा देती। फिर पेड़ों से सबसे मीठे फल और बेर तोड़कर लाती। हर दिन वह सोचती, "आज मेरे राम आएँगे।" शाम हो जाती, राम नहीं आते, पर शबरी का विश्वास कभी नहीं टूटा।

उधर सीता जी को ढूँढते हुए राम और लक्ष्मण दक्षिण की ओर चल रहे थे। रास्ते में कबंध नाम के एक श्रापित जीव ने उन्हें बताया, "पंपा सरोवर के पास मतंग ऋषि का आश्रम है। वहाँ शबरी नाम की एक तपस्विनी आपकी राह देख रही हैं। उनसे मिलिए, वे आपको आगे का रास्ता बताएँगी।"
एक दिन शबरी ने देखा कि रास्ते पर दो तेजस्वी राजकुमार चले आ रहे हैं। उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। "मेरे राम आ गए!" वह दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़ी। उसकी आँखों से ख़ुशी के आँसू बह रहे थे। उसने राम और लक्ष्मण के पैर धोए, उन्हें आसन पर बिठाया, और अपनी टोकरी से बेर निकाले।
लोक कथा कहती है कि शबरी हर बेर को पहले ख़ुद चखती, और जो मीठा होता, वही राम को देती, ताकि राम को कोई खट्टा बेर न मिले। लक्ष्मण ने यह देखा तो हैरान हुए, क्योंकि किसी का चखा हुआ फल देना ठीक नहीं माना जाता। पर राम ने बड़े प्रेम से एक-एक बेर खाया और कहा, "लक्ष्मण, ऐसे मीठे फल मैंने कभी नहीं खाए। इनमें प्रेम का स्वाद है।"
शबरी ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, मैं तो अनपढ़ भीलनी हूँ, मैं आपकी पूजा कैसे करूँ?" रामचरितमानस में राम ने शबरी को नवधा भक्ति, यानी भक्ति के नौ रूप बताए: संतों का साथ, भगवान की कथा में प्रेम, गुरु की सेवा, भगवान का गुणगान, नाम का जाप, अच्छा आचरण, सबमें भगवान को देखना, जो मिले उसमें संतोष, और सरल, निश्छल मन। राम ने कहा, "शबरी, तुम में ये सब हैं।"
फिर शबरी ने राम को बताया, "प्रभु, पास ही पंपा सरोवर है, और उसके आगे ऋष्यमूक पर्वत पर वानरराज सुग्रीव रहते हैं। उनसे मित्रता कीजिए, वे सीता जी को ढूँढने में आपकी मदद करेंगे।" इतना कहकर शबरी ने राम के दर्शन करते हुए योग से अपना शरीर त्याग दिया और परम धाम चली गईं।

इस कहानी से हम सीखते हैं कि भगवान को ऊँच-नीच, अमीर-गरीब या पढ़े-लिखे होने से कोई मतलब नहीं। उन्हें केवल सच्चा प्रेम और धैर्य भरा विश्वास चाहिए। शबरी ने बरसों इंतज़ार किया, और भगवान स्वयं उसके द्वार आए। जय श्री राम! जय माता शबरी!