
राम सेतु
4 मिनट · राम जी की कहानियाँ
हनुमान जी लंका जाकर माता सीता का पता लगा आए थे। अब श्री राम, लक्ष्मण, सुग्रीव और लाखों वानरों की सेना समुद्र के किनारे खड़ी थी। सामने अपार समुद्र लहरा रहा था, और उसके उस पार थी रावण की लंका। हनुमान जी तो उड़कर पहुँच गए थे, पर इतनी बड़ी सेना समुद्र कैसे पार करे? यह सबके मन में बड़ा सवाल था।
विभीषण जी, जो रावण के भाई थे और धर्म का साथ देने राम की शरण में आ गए थे, बोले, "प्रभु, समुद्र देव से प्रार्थना कीजिए। वे आपके पूर्वज राजा सगर के कुल से जुड़े हैं, वे ज़रूर रास्ता देंगे।" राम ने कुशा का आसन बिछाया, और समुद्र के किनारे बैठकर तीन दिन और तीन रात हाथ जोड़कर समुद्र देव से विनती करते रहे।
तीन दिन बीत गए, पर समुद्र देव प्रकट नहीं हुए। तब राम ने कहा, "लक्ष्मण, विनम्रता को कई लोग कमज़ोरी समझ लेते हैं। मेरा धनुष लाओ।" राम ने धनुष पर बाण चढ़ाया। सारा समुद्र खौलने लगा, मछलियाँ और जलजीव घबरा गए। तभी लहरों के बीच से समुद्र देव हाथ जोड़े प्रकट हुए।

समुद्र देव बोले, "प्रभु, क्षमा कीजिए। मेरा स्वभाव गहरा और अथाह होना है, मैं सूख नहीं सकता। पर आपकी सेना में नल नाम का एक वानर है, जो विश्वकर्मा जी का पुत्र है। उसे वरदान है कि वह जो पत्थर पानी में डालेगा, वह डूबेगा नहीं। उससे पुल बनवाइए। मैं उस पुल को थामे रहूँगा।"
फिर क्या था! पूरी वानर सेना काम में जुट गई। कोई बड़े-बड़े पत्थर लाता, कोई पेड़ उखाड़कर लाता, कोई पहाड़ों की चट्टानें। हनुमान जी तो पूरे के पूरे पहाड़ उठा लाते। नल और नील उन पत्थरों को ठीक से जमाते जाते, और पत्थर पानी पर तैरने लगते। लोक परंपरा कहती है कि वानर हर पत्थर पर "राम" लिख देते थे, और राम के नाम से पत्थर तैर जाते थे।
वाल्मीकि रामायण कहती है कि पहले दिन चौदह योजन पुल बना, दूसरे दिन बीस, और पाँच दिनों में सौ योजन लंबा पुल लंका तक बन गया। देवता और ऋषि आकाश से यह अद्भुत काम देखकर हैरान थे। ऐसा पुल पहले कभी किसी ने नहीं बनाया था।
इसी बीच एक प्यारी लोक कथा आती है। समुद्र किनारे एक नन्ही गिलहरी भी पुल बनाने में मदद कर रही थी। वह पानी में डुबकी लगाती, फिर किनारे की रेत में लोटती, और दौड़कर पुल पर जाकर अपने शरीर की रेत झाड़ देती, ताकि पत्थरों के बीच की जगह भर जाए। कुछ वानर हँसे, "अरे नन्ही, तेरी इस रेत से क्या होगा?"

राम ने यह देखा। उन्होंने गिलहरी को प्यार से अपनी हथेली पर उठाया और कहा, "जो जितना कर सकता है, पूरे मन से करे, वही सबसे बड़ी सेवा है। इस नन्ही गिलहरी का काम किसी से कम नहीं।" राम ने प्यार से उसकी पीठ पर अपनी उँगलियाँ फेरीं। कहते हैं तभी से गिलहरी की पीठ पर तीन धारियाँ होती हैं, राम की उँगलियों के निशान।
पुल बनने के बाद राम ने वहाँ भगवान शिव की पूजा की और एक शिवलिंग स्थापित किया, जिसे आज रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है। फिर पूरी वानर सेना उस पुल से समुद्र पार करके लंका पहुँच गई। आज भी भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र में पत्थरों की एक लंबी कतार दिखाई देती है, जिसे लोग राम सेतु कहते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि मिलकर काम करने से असंभव भी संभव हो जाता है। कोई काम छोटा नहीं होता, और कोई सहायक छोटा नहीं होता। गिलहरी की तरह हम भी अपनी पूरी शक्ति से अच्छे काम में साथ दें। जय श्री राम!