
सती और दक्ष का यज्ञ
4 मिनट · शिव जी की कहानियाँ
ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापतियों के राजा थे। उनकी कई बेटियाँ थीं, और सबसे प्यारी थीं सती। सती बचपन से ही भगवान शिव को मन ही मन अपना पति मान चुकी थीं। उन्होंने कठोर तप किया, और शिव जी ने प्रसन्न होकर उनसे विवाह किया। सती कैलाश पर्वत पर शिव जी के साथ बहुत आनंद से रहने लगीं।
पर राजा दक्ष को शिव जी अच्छे नहीं लगते थे। वे सोचते थे, "यह कैसा दामाद है? शरीर पर भस्म, गले में साँप, श्मशान में रहता है, और भूत-प्रेत इसके साथी हैं।" एक बार प्रजापतियों की एक बड़ी सभा में दक्ष आए। सब देवता उनके आदर में खड़े हो गए, पर शिव जी ध्यान में बैठे रहे। दक्ष को लगा कि दामाद ने ससुर का अपमान किया है। उस दिन से उनके मन में शिव जी के लिए क्रोध बैठ गया।
कुछ समय बाद दक्ष ने कनखल में, जो आज हरिद्वार के पास है, एक बहुत बड़ा यज्ञ रखा। सभी देवताओं, ऋषियों और राजाओं को न्योता भेजा गया। पर जान-बूझकर भगवान शिव और सती को नहीं बुलाया गया। एक दिन सती ने आकाश में देवताओं के विमान जाते देखे। पूछने पर पता चला कि वे सब उनके पिता के यज्ञ में जा रहे हैं।
सती का मन मायके जाने को मचल उठा। उन्होंने शिव जी से कहा, "प्रभु, मेरे पिता के घर इतना बड़ा उत्सव है। मेरी माँ और बहनें वहाँ होंगी। बेटी को अपने पिता के घर जाने के लिए न्योते की क्या ज़रूरत?" शिव जी ने प्यार से समझाया, "देवी, जहाँ आदर न हो, वहाँ बिना बुलाए जाना ठीक नहीं। तुम्हारे पिता मुझसे नाराज़ हैं। वहाँ तुम्हें दुख ही मिलेगा।" पर सती का मन नहीं माना, और वे नंदी और कुछ गणों के साथ पिता के घर चल पड़ीं।

यज्ञ मंडप में पहुँचकर सती ने देखा कि सब देवताओं के लिए यज्ञ में भाग रखा गया है, पर भगवान शिव का कोई भाग नहीं। माँ और बहनों ने तो प्यार से गले लगाया, पर पिता दक्ष ने उनकी ओर देखा तक नहीं। उलटे सबके सामने शिव जी के बारे में बुरा-भला कहने लगे।
सती से अपने पति का यह अपमान सहा नहीं गया। उन्होंने सभा में खड़े होकर कहा, "पिताजी, जिन शिव का नाम लेने से ही सबके पाप मिट जाते हैं, उनका आप अपमान कर रहे हैं। जिस शरीर को आपने जन्म दिया, उस शरीर में अब मैं नहीं रहना चाहती।" ऐसा कहकर सती ने योग में बैठकर ध्यान लगाया, और अपनी योग अग्नि से अपना शरीर त्याग दिया। सारी सभा में सन्नाटा छा गया।
जब यह समाचार कैलाश पहुँचा, तो भगवान शिव को बहुत दुख और क्रोध हुआ। उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र को प्रकट किया। वीरभद्र और शिव जी के गण यज्ञ स्थल पर पहुँचे और पूरा यज्ञ तहस-नहस कर दिया। दक्ष को उसके घमंड का दंड मिला, और उसके प्राण चले गए।
तब ब्रह्मा जी और सभी देवता कैलाश गए और भगवान शिव से हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "प्रभु, आप तो दया के सागर हैं। यज्ञ अधूरा न रहे, दक्ष को क्षमा कर दीजिए।" भोलेनाथ का मन पिघल गया। उन्होंने कहा, "ऐसा ही हो।" उन्होंने दक्ष को फिर से जीवन दिया, पर अब उनके शरीर पर बकरे का सिर था।

जीवित होते ही दक्ष का घमंड टूट चुका था। उन्होंने रोते हुए शिव जी के चरणों में सिर झुकाया और क्षमा माँगी। शिव जी ने उन्हें क्षमा कर दिया, और फिर से यज्ञ पूरा हुआ, इस बार भगवान शिव के भाग के साथ।
पर सती के जाने का दुख शिव जी के मन से नहीं गया। वे गहरे ध्यान में चले गए। परंपरा कहती है कि सती के अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने, जहाँ आज भी माँ की पूजा होती है। और सती ने अगला जन्म हिमालय की बेटी पार्वती के रूप में लिया, ताकि वे फिर से शिव जी की अर्धांगिनी बन सकें।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि घमंड बड़े से बड़े को गिरा देता है, और जीवनसाथी का सम्मान अपना ही सम्मान है। यह भी सीखते हैं कि सच्चा बड़प्पन क्षमा करने में है, जैसे भोलेनाथ ने दक्ष को क्षमा किया। हर हर महादेव!