
संजीवनी बूटी
4 मिनट · हनुमान जी की कहानियाँ
लंका में श्री राम की सेना और रावण की सेना के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। एक दिन रावण के पुत्र मेघनाद ने लक्ष्मण जी पर एक बहुत शक्तिशाली अस्त्र चलाया, जिसे शक्ति कहते हैं। शक्ति लगते ही लक्ष्मण जी अचेत होकर धरती पर गिर पड़े। पूरी सेना में हाहाकार मच गया।
हनुमान जी लक्ष्मण जी को उठाकर श्री राम के पास ले आए। अपने प्यारे भाई को इस हालत में देखकर श्री राम का धीरज टूट गया। उन्होंने लक्ष्मण जी का सिर अपनी गोद में रखा और रोते हुए कहने लगे, "लक्ष्मण, तुम मेरे लिए महल छोड़कर वन में आए। अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो मैं अयोध्या जाकर माता सुमित्रा को क्या मुँह दिखाऊँगा?"
तब विभीषण ने कहा, "प्रभु, लंका में सुषेण नाम के एक बहुत बड़े वैद्य रहते हैं। वे ही लक्ष्मण जी का इलाज कर सकते हैं।" हनुमान जी उसी पल उड़कर लंका गए, और सुषेण वैद्य को उनके घर सहित उठाकर ले आए। सुषेण ने लक्ष्मण जी को देखा और कहा, "इनके प्राण बच सकते हैं, पर इसके लिए हिमालय के द्रोणागिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लानी होगी, और वह भी सूरज उगने से पहले।"

हिमालय बहुत दूर था, और रात बहुत छोटी। पर हनुमान जी ने कहा, "प्रभु, आप चिंता मत कीजिए। सूरज उगने से पहले मैं संजीवनी लेकर लौट आऊँगा।" श्री राम को प्रणाम करके वे पवन के वेग से उत्तर की ओर उड़ चले।
रावण को यह पता चल गया। उसने कालनेमि नाम के एक मायावी राक्षस को भेजा, ताकि वह हनुमान जी को रास्ते में रोक ले। कालनेमि साधु का वेश बनाकर एक आश्रम में बैठ गया। हनुमान जी प्यास लगने पर वहाँ रुके, तो उसने उन्हें एक सरोवर में भेजा, जहाँ एक मगरी ने उन्हें पकड़ लिया। हनुमान जी ने उसे हरा दिया, और वह एक अप्सरा बनकर श्राप से मुक्त हुई। उसी ने बताया कि यह साधु असल में राक्षस है। हनुमान जी ने कालनेमि का भी अंत कर दिया और आगे बढ़ गए।
द्रोणागिरि पर्वत पहुँचकर हनुमान जी ने देखा कि वहाँ तो हज़ारों जड़ी-बूटियाँ चमक रही हैं। रात के अँधेरे में वे पहचान न सके कि संजीवनी कौन-सी है। समय बहुत कम था। तब हनुमान जी ने सोचा, "अगर गलत बूटी ले गया, तो सब व्यर्थ हो जाएगा। मैं पूरा पर्वत ही उठा ले चलता हूँ।" और उन्होंने पूरा द्रोणागिरि पर्वत उखाड़कर अपनी हथेली पर रख लिया।
लौटते समय वे अयोध्या के ऊपर से उड़े। वहाँ नंदीग्राम में भरत जी तपस्वी बनकर श्री राम की राह देख रहे थे। रात में आकाश में पर्वत लेकर उड़ते किसी को देखकर उन्हें लगा कि कोई राक्षस है, और उन्होंने एक बाण चला दिया। हनुमान जी "राम, राम" कहते हुए नीचे आ गिरे। राम का नाम सुनकर भरत जी दौड़े आए। सारी बात जानकर वे बहुत दुखी हुए, और बोले, "मेरे बाण पर बैठ जाओ, मैं तुम्हें पल भर में प्रभु के पास पहुँचा दूँगा।" हनुमान जी ने उन्हें प्रणाम किया और कहा, "आपके आशीर्वाद से मैं स्वयं ही पहुँच जाऊँगा।"
हनुमान जी सूरज उगने से पहले ही पर्वत लेकर लंका पहुँच गए। सुषेण वैद्य ने तुरंत संजीवनी बूटी पहचानी, उसका रस बनाया और लक्ष्मण जी को सुँघाया। थोड़ी ही देर में लक्ष्मण जी ने आँखें खोल दीं और उठकर बैठ गए, मानो नींद से जागे हों। पूरी सेना "जय श्री राम" के नारों से गूँज उठी।

श्री राम ने हनुमान जी को गले से लगा लिया और कहा, "तुम मुझे भरत के समान प्रिय हो।" हनुमान चालीसा में भी आता है, "लाय सजीवन लखन जियाये, श्रीरघुबीर हरषि उर लाये", यानी संजीवनी लाकर लक्ष्मण जी को जीवन दिया, और श्री राम ने हर्ष से उन्हें हृदय से लगा लिया। वाल्मीकि रामायण में तो हनुमान जी दो बार औषधियों का पर्वत लाते हैं, एक बार पूरी सेना को बचाने के लिए और एक बार लक्ष्मण जी के लिए।
इसीलिए हनुमान जी को संकटमोचन कहते हैं, यानी संकट दूर करने वाले। इस कहानी से हम सीखते हैं कि जब किसी अपने पर संकट हो, तो हार नहीं माननी चाहिए। रास्ते में कितनी भी रुकावटें आएँ, सच्ची लगन और बुद्धि से हर काम समय पर पूरा हो सकता है। बोलो संकटमोचन हनुमान की जय!