
भीम और बूढ़ा वानर
4 मिनट · हनुमान जी की कहानियाँ
यह कहानी रामायण के बहुत बाद, महाभारत के समय की है। पांडव अपने वनवास के दिनों में हिमालय में बदरिकाश्रम के पास रह रहे थे। पाँचों भाइयों में भीम सबसे बलवान थे। वे पवन देव के पुत्र थे, ठीक हनुमान जी की तरह। इस तरह भीम और हनुमान जी भाई थे, पर भीम यह बात नहीं जानते थे।
एक दिन हवा के साथ उड़ता हुआ एक बहुत सुंदर, सुगंधित सहस्रदल कमल द्रौपदी के पास आकर गिरा। उसकी खुशबू इतनी मीठी थी कि द्रौपदी खुश हो गईं। उन्होंने भीम से कहा, "ऐसे और फूल ले आओ न।" भीम तुरंत अपनी गदा उठाकर उस दिशा में चल पड़े, जिधर से हवा आ रही थी।
भीम को अपने बल पर बहुत गर्व था। वे गंधमादन पर्वत पर चढ़ते हुए ज़ोर-ज़ोर से गर्जना करते, पेड़ तोड़ते और जंगल के जानवरों को डराते हुए आगे बढ़ रहे थे। चलते-चलते वे केलों के एक बड़े बगीचे में पहुँचे। वहाँ रास्ते के बीचों-बीच एक बूढ़ा वानर लेटा हुआ था, और उसकी लंबी पूँछ पूरे रास्ते पर फैली हुई थी।
भीम ने ज़ोर से कहा, "ऐ वानर, रास्ते से हटो। मुझे आगे जाना है।" वानर ने धीरे से आँखें खोलीं और बोला, "बेटा, मैं बूढ़ा और बीमार हूँ। मुझसे उठा नहीं जाता। तुम्हें इतनी जल्दी है, तो मेरी पूँछ एक ओर हटाकर निकल जाओ।"
भीम हँसे। उन्होंने सोचा, "एक बूढ़े वानर की पूँछ हटाना कौन-सी बड़ी बात है।" उन्होंने बाएँ हाथ से पूँछ उठानी चाही, पर पूँछ हिली तक नहीं। फिर उन्होंने दोनों हाथ लगाए, पूरा बल लगाया, दाँत भींच लिए, माथे पर पसीना आ गया, पर पूँछ ज़रा भी नहीं हिली।

भीम का सारा घमंड पल भर में उतर गया। वे लज्जित होकर हाथ जोड़कर बोले, "आप कोई साधारण वानर नहीं हैं। कृपया बताइए, आप कौन हैं? कोई देवता हैं, गंधर्व हैं, या कोई और?" बूढ़ा वानर मुस्कुराया और बोला, "मैं हनुमान हूँ, श्री राम का सेवक, और पवन देव का पुत्र। इस तरह तुम मेरे छोटे भाई हो।"
यह सुनते ही भीम खुशी से भर गए और हनुमान जी के चरणों में गिर पड़े। हनुमान जी ने उन्हें प्रेम से उठाया और श्री राम की कथा सुनाई, कैसे उन्होंने समुद्र लाँघा, सीता माता को खोजा और रावण की लंका जलाई। भीम ने विनती की, "भैया, जिस रूप में आपने समुद्र लाँघा था, वह रूप मुझे भी दिखाइए।"
हनुमान जी ने अपना शरीर बढ़ाना शुरू किया। वे बढ़ते गए, बढ़ते गए, और एक विशाल पर्वत जितने बड़े हो गए। उनका तेज सूरज जैसा था, और पूरा जंगल उनकी छाया में आ गया। भीम ने आँखें मूँद लीं और हाथ जोड़कर बोले, "भैया, बस कीजिए, मैं आपकी ओर देख भी नहीं पा रहा।" हनुमान जी फिर से अपने छोटे रूप में आ गए।

हनुमान जी ने भीम को गले लगाया, तो भीम को लगा कि उनकी सारी थकान दूर हो गई और बल पहले से कई गुना बढ़ गया। हनुमान जी ने कहा, "भाई, बल पर घमंड मत करना। बल वही अच्छा है जो कमज़ोरों की रक्षा करे। और सुनो, जब तुम युद्ध में गर्जना करोगे, तो मैं अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठकर तुम्हारे साथ गर्जना करूँगा, जिससे शत्रु काँप उठेंगे।"
इसीलिए महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ पर हनुमान जी की ध्वजा लहराती थी, और अर्जुन को कपिध्वज भी कहते हैं, यानी जिनकी ध्वजा पर कपि, यानी वानर हैं। फिर हनुमान जी ने भीम को उस सरोवर का रास्ता बताया, जहाँ वे सुगंधित कमल खिलते थे। भीम फूल लेकर द्रौपदी के पास लौटे, पर इस बार वे पहले से कहीं ज़्यादा विनम्र थे।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि अपने बल पर कभी घमंड नहीं करना चाहिए, और किसी को बूढ़ा या कमज़ोर देखकर उसका निरादर नहीं करना चाहिए। सच्चा बलवान वही है जो विनम्र हो। बोलो पवनपुत्र हनुमान की जय!