
समुद्र लाँघना
4 मिनट · हनुमान जी की कहानियाँ
सुग्रीव ने सीता माता को खोजने के लिए वानरों की टोलियाँ चारों दिशाओं में भेजी थीं। दक्षिण दिशा की टोली में युवराज अंगद, बूढ़े और ज्ञानी रीछराज जाम्बवान, और हनुमान जी थे। श्री राम ने हनुमान जी को अपनी अंगूठी दी थी, ताकि सीता माता उन्हें पहचान सकें।
बहुत दिनों तक वन-वन भटकने के बाद यह टोली समुद्र के किनारे पहुँची। वहाँ उन्हें गिद्धराज संपाति मिले, जो जटायु के बड़े भाई थे। उन्होंने बताया, "रावण सीता को समुद्र के उस पार लंका ले गया है। लंका यहाँ से सौ योजन दूर है।" यह सुनकर सब वानर खुश भी हुए और चिंता में भी पड़ गए। इतना बड़ा समुद्र पार कौन करेगा?
हर वानर ने बताया कि वह कितनी दूर छलाँग लगा सकता है। किसी ने दस योजन कहा, किसी ने बीस, किसी ने पचास। अंगद ने कहा, "मैं उस पार तो पहुँच जाऊँगा, पर शायद लौट न सकूँ।" जाम्बवान जी बोले, "जवानी में मैं बहुत दूर जा सकता था, पर अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ।" सब उदास होकर बैठ गए।
तभी जाम्बवान जी की नज़र हनुमान जी पर पड़ी, जो चुपचाप एक ओर बैठे थे। ऋषियों के श्राप के कारण हनुमान जी अपनी शक्ति भूले हुए थे। जाम्बवान जी उनके पास गए और बोले, "हनुमान, तुम चुप क्यों बैठे हो? तुम पवन देव के पुत्र हो। बचपन में तुमने सूरज को फल समझकर छलाँग लगाई थी। सब देवताओं ने तुम्हें वरदान दिए हैं। तुम्हारे जैसा बल किसी में नहीं। यह काम केवल तुम ही कर सकते हो।"

जाम्बवान जी की बातें सुनते ही हनुमान जी को सब याद आ गया। उनकी शक्ति जाग उठी। उनका शरीर बढ़ने लगा, और वे पर्वत जितने बड़े हो गए। उन्होंने ज़ोर से गर्जना की, जिससे सारे वानर खुशी से उछल पड़े। हनुमान जी बोले, "मैं समुद्र लाँघकर लंका जाऊँगा, सीता माता को खोजूँगा, और प्रभु का संदेश उन तक पहुँचाऊँगा।"
हनुमान जी महेंद्र पर्वत पर चढ़ गए। उन्होंने श्री राम का नाम लिया, अपने पिता पवन देव को प्रणाम किया, और पूरे बल से छलाँग लगाई। उनके पैरों के दबाव से पूरा पर्वत काँप उठा, पेड़ों से फूल झड़ने लगे, और वे पवन के वेग से आकाश में उड़ चले।
रास्ते में समुद्र के बीच से मैनाक पर्वत ऊपर उठा और बोला, "हे पवनपुत्र, थोड़ी देर मुझ पर विश्राम कर लीजिए।" हनुमान जी ने उसे हाथ से छूकर प्रणाम किया और प्रेम से कहा, "राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम", यानी प्रभु राम का काम किए बिना मुझे विश्राम कहाँ? और वे आगे बढ़ गए।
फिर देवताओं ने हनुमान जी की परीक्षा लेने के लिए नागों की माता सुरसा को भेजा। सुरसा ने राक्षसी का रूप धरा और रास्ता रोककर बोली, "देवताओं ने तुम्हें मेरा भोजन बनाया है। मेरे मुँह में आओ।" हनुमान जी ने अपना शरीर बड़ा किया, तो सुरसा ने अपना मुँह उससे भी बड़ा कर लिया। वे और बड़े हुए, सुरसा का मुँह और बड़ा हुआ।

तब हनुमान जी ने बुद्धि से काम लिया। जैसे ही सुरसा ने मुँह सौ योजन फैलाया, हनुमान जी पल भर में अँगूठे जितने छोटे हो गए, उसके मुँह में जाकर तुरंत बाहर निकल आए और हाथ जोड़कर बोले, "माता, आपकी बात भी रह गई, अब मुझे जाने दीजिए।" सुरसा प्रसन्न हो गईं और आशीर्वाद दिया, "तुम्हारा काम ज़रूर सफल होगा।"
आगे सिंहिका नाम की एक राक्षसी मिली, जो समुद्र में रहती थी और आकाश में उड़ने वालों की परछाईं पकड़कर उन्हें खींच लेती थी। उसने हनुमान जी की परछाईं पकड़ ली। हनुमान जी समझ गए और उन्होंने उस राक्षसी को हरा दिया। फिर वे बिना रुके उड़ते गए और अंत में लंका के तट पर त्रिकूट पर्वत पर उतर गए।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि हम सबके अंदर बहुत शक्ति छिपी है, बस कोई सही समय पर उसकी याद दिला दे। और यह भी कि रास्ते में आराम का लालच आए या कठिनाई, बल और बुद्धि दोनों से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए। बोलो जय श्री राम, जय हनुमान!