
अशोक वाटिका में सीता माता
4 मिनट · हनुमान जी की कहानियाँ
लंका के तट पर उतरकर हनुमान जी ने चारों ओर देखा। लंका सोने की नगरी थी, ऊँचे-ऊँचे महल, चमकते द्वार और हर ओर राक्षसों का पहरा। हनुमान जी ने सोचा, "दिन में मैं पकड़ा जाऊँगा। रात होने पर छोटा रूप धरकर नगर में जाऊँगा।" जब अँधेरा हुआ, तो वे एक बिल्ली जितने छोटे हो गए और चुपचाप लंका में घुस गए।
उन्होंने महल-महल, घर-घर सीता माता को खोजा। रावण का महल देखा, उसकी रानियों के कक्ष देखे, पर सीता माता कहीं नहीं मिलीं। हनुमान जी उदास होने लगे। फिर उन्होंने सोचा, "हार मानना ठीक नहीं। उत्साह ही हर काम की जड़ है।" उन्होंने श्री राम का ध्यान किया और फिर खोज में लग गए।
खोजते-खोजते वे एक सुंदर बगीचे में पहुँचे, जिसका नाम था अशोक वाटिका। वहाँ अशोक के बहुत से पेड़ थे। एक घने शिंशपा के पेड़ के नीचे उन्होंने एक दुबली-पतली, उदास स्त्री को बैठे देखा। उनके कपड़े मैले थे, आँखों में आँसू थे, और वे बार-बार "राम, राम" कह रही थीं। चारों ओर डरावनी राक्षसियाँ पहरा दे रही थीं। हनुमान जी समझ गए कि यही सीता माता हैं। वे पेड़ की डालियों में छिपकर बैठ गए।
तभी रावण वहाँ आया और सीता माता को डराने-धमकाने लगा। सीता जी ने एक तिनका बीच में रखकर, उसकी ओर देखे बिना कहा, "मैं केवल श्री राम की हूँ। तुम्हारा अंत निकट है।" रावण क्रोध में दो महीने का समय देकर चला गया। सीता माता बहुत दुखी हो गईं।
तब हनुमान जी ने पेड़ पर बैठे-बैठे बहुत धीमे, मीठे स्वर में श्री राम की कथा सुनानी शुरू की। राजा दशरथ, वनवास, सीता हरण, राम-सुग्रीव की मित्रता, सब कुछ। अपने प्रभु का नाम और कथा सुनकर सीता माता चौंक गईं और ऊपर देखा। हनुमान जी नीचे उतरे और हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

पहले तो सीता माता को लगा कि कहीं यह रावण का कोई छल न हो। तब हनुमान जी ने श्री राम और लक्ष्मण जी का पूरा रूप-रंग बताया, और फिर प्रभु की अंगूठी निकालकर माता के हाथों में रख दी। अंगूठी पर राम नाम लिखा था। उसे देखते ही सीता माता की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उन्होंने अंगूठी को अपने हृदय से लगा लिया, मानो स्वयं प्रभु मिल गए हों।
हनुमान जी ने कहा, "माता, आप चाहें तो मैं आपको अभी अपनी पीठ पर बिठाकर प्रभु के पास ले चलूँ।" सीता माता ने प्रेम से मना कर दिया और कहा, "पुत्र, तुम ऐसा कर सकते हो, यह मैं जानती हूँ। पर प्रभु स्वयं आकर रावण को हराएँ और मुझे ले जाएँ, इसी में उनका यश है।"
फिर सीता माता ने अपने बालों में लगी चूड़ामणि उतारकर हनुमान जी को दी और कहा, "यह प्रभु को देना। और उन्हें वह बात याद दिलाना, जब चित्रकूट में एक कौए ने मुझे सताया था और प्रभु ने एक तिनके को बाण बनाकर उसे दंड दिया था। तब वे समझ जाएँगे कि तुम सच में मुझसे मिले हो।"

सीता माता ने हनुमान जी को आशीर्वाद दिया, "पुत्र, तुम अजर-अमर रहो, और सदा गुणों के भंडार बने रहो।" हनुमान चालीसा में भी आता है, "अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता।" माता के आशीर्वाद से हनुमान जी का मन आनंद से भर गया।
जाने से पहले हनुमान जी ने भोलेपन से कहा, "माता, बहुत भूख लगी है। इस बगीचे में मीठे फल लगे हैं, क्या मैं खा लूँ?" सीता माता मुस्कुराईं और बोलीं, "खा लो, पर राक्षसों से सावधान रहना।" आगे क्या हुआ, यह हम अगली कहानी, लंका दहन, में पढ़ेंगे।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि हिम्मत कभी नहीं हारनी चाहिए। हनुमान जी को सारी रात सीता माता नहीं मिलीं, पर उन्होंने खोज नहीं छोड़ी। और सीता माता ने सिखाया कि सच्चा विश्वास कठिन से कठिन समय में भी डगमगाता नहीं। बोलो सियावर रामचंद्र की जय!