
श्री राम से पहली भेंट
4 मिनट · हनुमान जी की कहानियाँ
हनुमान जी बड़े होकर वानरराज सुग्रीव के मंत्री और सबसे अच्छे मित्र बन गए थे। सुग्रीव के बड़े भाई बाली ने उनका राज्य और घर छीनकर उन्हें किष्किंधा से निकाल दिया था। बाली बहुत बलवान था, इसलिए सुग्रीव डर के मारे अपने कुछ साथियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहते थे, क्योंकि एक श्राप के कारण बाली वहाँ नहीं आ सकता था।
उन्हीं दिनों भगवान राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण वन में माता सीता को खोज रहे थे। रावण छल से सीता माता को उठा ले गया था। सीता जी को ढूँढते-ढूँढते दोनों भाई पंपा सरोवर के पास पहुँचे, जो ऋष्यमूक पर्वत के पास ही था।
सुग्रीव ने पर्वत से देखा कि दो वीर पुरुष धनुष-बाण लिए इधर ही आ रहे हैं। उनका मन डर गया। उन्होंने हनुमान जी से कहा, "कहीं बाली ने इन्हें मुझे मारने तो नहीं भेजा? तुम जाकर पता लगाओ कि ये कौन हैं। पर अपना रूप बदलकर जाना, ताकि उन्हें शक न हो।"

हनुमान जी ने एक साधु ब्राह्मण का रूप धरा और दोनों भाइयों के पास पहुँचे। उन्होंने आदर से प्रणाम किया और बहुत मीठी, सधी हुई भाषा में पूछा, "आप दोनों तो राजकुमारों जैसे तेजस्वी हैं, फिर भी वन में तपस्वियों के वेश में क्यों घूम रहे हैं? आपके हाथों में धनुष हैं, पर चेहरे पर शांति है। कृपया बताइए, आप कौन हैं?"
हनुमान जी की बातें सुनकर श्री राम बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "लक्ष्मण, जिसने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद न पढ़े हों, वह ऐसे नहीं बोल सकता। इसने इतनी देर बात की, पर एक भी शब्द गलत नहीं बोला। न बहुत धीरे, न बहुत तेज़। ऐसा दूत जिस राजा के पास हो, उसके सारे काम सिद्ध हो जाते हैं।"
लक्ष्मण जी ने हनुमान जी को सब बताया, "ये अयोध्या के राजा दशरथ के बड़े पुत्र श्री राम हैं, और मैं इनका छोटा भाई लक्ष्मण। पिता की आज्ञा से हम वन में आए थे। यहाँ किसी राक्षस ने भाभी सीता जी का हरण कर लिया है। हम उन्हीं को खोज रहे हैं, और सुग्रीव से मिलना चाहते हैं।"
राम का नाम सुनते ही हनुमान जी का हृदय भर आया। उन्होंने तुरंत अपना असली रूप धरा और श्री राम के चरणों में गिर पड़े। आँखों से आँसू बह निकले। वे बोले, "प्रभु, मैं आपका दास हूँ। आप मेरे स्वामी हैं, और मैं आपको पहचान न सका। मुझे क्षमा कीजिए।" श्री राम ने उन्हें उठाकर गले से लगा लिया।

फिर हनुमान जी ने कहा, "प्रभु, सुग्रीव जी इसी पर्वत पर हैं। वे भी बहुत दुखी हैं। आप दोनों की मित्रता से दोनों के दुख दूर होंगे।" यह कहकर हनुमान जी ने अपना शरीर बड़ा किया, श्री राम और लक्ष्मण जी को अपने दोनों कंधों पर बिठाया, और उन्हें पर्वत पर सुग्रीव के पास ले गए।
सुग्रीव ने आदर से दोनों भाइयों का स्वागत किया और अपना सारा दुख बताया। हनुमान जी ने लकड़ियाँ जलाकर अग्नि प्रज्वलित की। अग्नि को साक्षी मानकर श्री राम और सुग्रीव ने उसकी परिक्रमा की और जीवन भर की मित्रता का वचन दिया। श्री राम ने सुग्रीव को उनका राज्य दिलाने का वचन दिया, और सुग्रीव ने सीता माता को खोजने का।
उस दिन से हनुमान जी श्री राम के सबसे प्रिय भक्त और सेवक बन गए। गुरु सूर्य देव को दिया हुआ वचन, कि वे सुग्रीव की रक्षा करेंगे, अब उन्हें अपने प्रभु तक ले आया था। हनुमान चालीसा में भी आता है, "तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा।"
इस कहानी से हम सीखते हैं कि मीठी और सच्ची वाणी सबका मन जीत लेती है, और सच्चा भक्त अपने भगवान को देखते ही पहचान लेता है। हनुमान जी ने अपने मित्र का भला किया, तो उन्हें अपने प्रभु मिल गए। बोलो सियावर रामचंद्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय!