
नवदुर्गा, माँ के नौ रूप
4 मिनट · दुर्गा जी की कहानियाँ
नवरात्रि के नौ दिनों में हम माँ दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा करते हैं। इन्हें नवदुर्गा कहते हैं। दुर्गा सप्तशती के देवी कवच में एक श्लोक है जो इन नौ रूपों के नाम बताता है: "प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी, तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।" आइए, हर रूप की छोटी-सी कहानी जानें।
पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा होती है। शैल यानी पर्वत, और पुत्री यानी बेटी। सती ने अगला जन्म पर्वतराज हिमालय के घर लिया, इसलिए वे शैलपुत्री कहलाईं। उनके हाथ में त्रिशूल और कमल है, और वे नंदी बैल पर सवार हैं। दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। यह माँ पार्वती का वह रूप है जब उन्होंने शिव जी को पाने के लिए हज़ारों बरस कठोर तप किया। उनके एक हाथ में जप की माला है और दूसरे में कमंडल।

तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है। उनके माथे पर घंटे के आकार का आधा चाँद है। कहते हैं कि शिव जी से विवाह के समय माँ ने यह रूप धरा था। उनके घंटे की आवाज़ से बुराई दूर भागती है, और भक्तों को शांति मिलती है। चौथे दिन माँ कूष्मांडा की पूजा होती है। जब कहीं कुछ नहीं था, चारों ओर अँधेरा था, तब माँ ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। उनका तेज सूरज में भी बसता है।
पाँचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा होती है। स्कंद यानी कार्तिकेय, जो देवताओं के सेनापति बने और तारकासुर को हराया। उनकी माता होने से माँ स्कंदमाता कहलाईं। इस रूप में बाल कार्तिकेय माँ की गोद में बैठे होते हैं। छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा होती है। महर्षि कात्यायन की तपस्या से उनके आश्रम में माँ प्रकट हुईं, इसलिए वे कात्यायनी कहलाईं। भागवत पुराण में आता है कि वृंदावन की गोपियों ने श्री कृष्ण को पाने के लिए माँ कात्यायनी का व्रत किया था।
सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा होती है। उनका रूप देखने में भयंकर है, खुले बाल, गहरा रंग, पर वे सदा शुभ फल देती हैं, इसलिए उन्हें शुभंकरी भी कहते हैं। वे अँधेरे और डर का नाश करती हैं। आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा होती है। कठोर तप से माँ पार्वती का रंग गहरा हो गया था। शिव जी ने प्रसन्न होकर गंगा जल से उन्हें स्नान कराया, और वे अत्यंत गोरी और उज्ज्वल हो गईं। वे सफ़ेद वस्त्र पहनती हैं और सफ़ेद बैल पर सवार होती हैं।
नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा होती है। वे सारी सिद्धियाँ और ज्ञान देने वाली हैं। शास्त्र कहते हैं कि भगवान शिव ने भी इन्हीं की कृपा से सिद्धियाँ पाईं, और उन्हीं की कृपा से उनका आधा शरीर देवी का हुआ, जिसे अर्धनारीश्वर कहते हैं। माँ सिद्धिदात्री कमल पर विराजती हैं।
अष्टमी या नवमी को कई घरों में कन्या पूजन होता है। छोटी बच्चियों को माँ का रूप मानकर घर बुलाया जाता है। उनके पैर धोए जाते हैं, माथे पर तिलक लगाया जाता है, कलाई पर मौली बाँधी जाती है, और उन्हें पूरी, हलवा और काले चने खिलाए जाते हैं। साथ में एक छोटे बालक को भी बिठाया जाता है, जिसे लांगुरिया या भैरव का रूप माना जाता है। फिर बच्चियों को उपहार देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।

नवरात्रि के पहले दिन घरों में कलश स्थापना होती है, और मिट्टी में जौ बोए जाते हैं। नौ दिनों में जौ हरे-भरे होकर उग आते हैं, जो सुख और समृद्धि का संकेत माने जाते हैं। कई लोग नौ दिन व्रत रखते हैं, और रोज़ माँ के एक रूप की आरती गाते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि माँ एक हैं, पर उनके रूप अनेक हैं: कभी बेटी, कभी तपस्विनी, कभी माँ, कभी रक्षक। हर रूप हमें कुछ सिखाता है: धैर्य, तप, साहस, ममता और ज्ञान। और हमें हर बेटी में माँ का रूप देखकर उसका आदर करना चाहिए। जय माता दी!