
श्री राम का जन्म और विश्वामित्र
4 मिनट · राम जी की कहानियाँ
सरयू नदी के किनारे अयोध्या नाम की एक सुंदर नगरी थी। वहाँ राजा दशरथ राज करते थे। वे धर्मात्मा, न्यायप्रिय और प्रजा के प्यारे राजा थे। उनकी तीन रानियाँ थीं: कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा। राज्य में सब सुख था, पर राजा के मन में एक बड़ा दुख था। उनके कोई संतान नहीं थी, और वे सोचते कि उनके बाद यह राज्य कौन सँभालेगा।
गुरु वशिष्ठ की सलाह पर राजा दशरथ ने ऋषि ऋष्यशृंग को बुलाया और पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ पूरा होने पर अग्नि से एक तेजस्वी दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनके हाथ में सोने के पात्र में खीर थी। उन्होंने कहा, "राजन, यह खीर अपनी रानियों को खिलाइए। आपके घर पुत्र जन्म लेंगे।"
राजा ने खीर का आधा भाग रानी कौशल्या को दिया, एक चौथाई रानी सुमित्रा को, और बाकी में से रानी कैकेयी को, और जो बचा वह फिर सुमित्रा को। समय आने पर चैत्र महीने की नवमी को रानी कौशल्या ने श्री राम को जन्म दिया। रानी कैकेयी के पुत्र हुए भरत, और रानी सुमित्रा के दो पुत्र हुए, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। उसी दिन को आज हम राम नवमी के रूप में मनाते हैं।

अयोध्या में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। गली-गली में मंगल गीत गाए गए। शास्त्र कहते हैं कि श्री राम के रूप में स्वयं भगवान विष्णु ने अवतार लिया था, ताकि धरती से रावण जैसे अधर्मी का अंत हो सके। चारों भाई साथ-साथ बड़े होने लगे। राम और लक्ष्मण में बहुत प्रेम था, और भरत और शत्रुघ्न भी हमेशा साथ रहते।
चारों राजकुमारों ने गुरु वशिष्ठ के आश्रम में वेद, शास्त्र, धनुष-बाण और राजधर्म सीखा। राम सबसे विनम्र थे। वे माता-पिता और गुरुओं का बहुत आदर करते, और प्रजा के दुख-सुख का ध्यान रखते। सारी अयोध्या उन्हें प्यार करती थी।
जब राम लगभग सोलह बरस के थे, तभी एक दिन महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के दरबार में आए। राजा ने आदर से पूछा, "मुनिवर, आज्ञा दीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?" विश्वामित्र बोले, "राजन, मैं वन में यज्ञ करता हूँ, पर मारीच और सुबाहु नाम के राक्षस आकर उसे भंग कर देते हैं। अपने पुत्र राम को मेरे साथ भेज दीजिए। वही उनसे यज्ञ की रक्षा कर सकते हैं।"
यह सुनकर राजा दशरथ घबरा गए। वे बोले, "मुनिवर, राम तो अभी बालक है। आप मेरी पूरी सेना ले जाइए, मैं स्वयं चलूँगा, पर राम को मत माँगिए।" तब गुरु वशिष्ठ ने समझाया, "राजन, विश्वामित्र जी के साथ रहकर राम का भला ही होगा। वे उन्हें ऐसी विद्याएँ देंगे जो किसी के पास नहीं।" राजा मान गए, और राम के साथ लक्ष्मण भी चल पड़े।
वन के रास्ते में विश्वामित्र जी ने दोनों भाइयों को "बला" और "अतिबला" नाम की दो विद्याएँ सिखाईं, जिनसे भूख-प्यास और थकान नहीं लगती। उन्होंने रास्ते भर पुरानी कथाएँ सुनाईं, और आगे चलकर कई दिव्य अस्त्र भी दिए। राम और लक्ष्मण बड़ी श्रद्धा से गुरु की सेवा करते, उनके पैर दबाते, और उनकी हर बात ध्यान से सुनते।

सिद्धाश्रम पहुँचकर विश्वामित्र जी ने छह दिन का यज्ञ शुरू किया। राम और लक्ष्मण छह दिन और छह रात बिना सोए धनुष लिए पहरा देते रहे। छठे दिन मारीच और सुबाहु आकाश से आए। राम ने एक बाण से मारीच को सौ योजन दूर समुद्र में फेंक दिया, और सुबाहु का अंत कर दिया। यज्ञ निर्विघ्न पूरा हुआ, और ऋषियों ने दोनों भाइयों को ढेरों आशीर्वाद दिए।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि गुरु की सेवा और आज्ञा मानने से ही सच्ची विद्या मिलती है। राम राजकुमार थे, फिर भी उन्होंने वन में गुरु के साथ कठिन जीवन ख़ुशी से अपनाया। अच्छे काम की रक्षा के लिए साहस से खड़े होना ही धर्म है। जय श्री राम!