
अहल्या का उद्धार
4 मिनट · राम जी की कहानियाँ
यज्ञ की रक्षा के बाद महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को लेकर मिथिला की ओर चले, जहाँ राजा जनक एक बड़ा यज्ञ कर रहे थे। रास्ते में वे एक ऐसे आश्रम के पास पहुँचे जो बहुत पुराना और सुनसान था। वहाँ कोई पक्षी नहीं चहचहाता था, कोई यज्ञ का धुआँ नहीं उठता था। पेड़ों पर लताएँ चढ़ गई थीं, और झोंपड़ी के आसपास सूखे पत्ते बिखरे पड़े थे।
राम ने आदर से पूछा, "गुरुदेव, यह सुंदर आश्रम ऐसा सूना क्यों है? यहाँ कौन रहता था?" विश्वामित्र जी ने एक पत्थर पर बैठकर कहानी सुनाई, "राम, यह महर्षि गौतम का आश्रम है। वे यहाँ अपनी पत्नी अहल्या के साथ रहते थे। अहल्या बहुत सुंदर और गुणी थीं। ब्रह्मा जी ने स्वयं उन्हें बनाया था।"

"एक दिन देवराज इंद्र ने छल किया। उन्होंने गौतम ऋषि का रूप धरकर अहल्या को धोखा दिया। जब गौतम ऋषि लौटे और सब जाना, तो उन्हें बहुत क्रोध आया। उन्होंने इंद्र को श्राप दिया, और अहल्या से कहा, 'तुम हज़ारों बरस यहीं इस आश्रम में अकेली, बिना कुछ खाए, केवल हवा पीकर, सबकी आँखों से ओझल होकर तप करोगी। जब दशरथ के पुत्र राम इस आश्रम में आएँगे, तब उनके दर्शन से तुम पवित्र हो जाओगी और फिर मेरे पास लौट आओगी।'"
विश्वामित्र जी ने आगे कहा, "उस दिन से अहल्या यहीं तप कर रही हैं, किसी को दिखाई नहीं देतीं, और गौतम ऋषि हिमालय चले गए। राम, अब वह समय आ गया है। चलो, भीतर चलो।" कई कथाओं में, जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस में, यह भी कहा गया है कि अहल्या श्राप से पत्थर की शिला बन गई थीं।
राम ने जैसे ही आश्रम में क़दम रखा, सारा आश्रम एक दिव्य प्रकाश से भर गया। उस प्रकाश में अहल्या प्रकट हुईं। उनका चेहरा तप के तेज से ऐसे चमक रहा था, जैसे बादलों में छिपा चाँद निकल आया हो, या धुएँ में छिपी अग्नि की लौ। बरसों के तप ने उन्हें पवित्र और शांत बना दिया था।
राम और लक्ष्मण ने आगे बढ़कर अहल्या के चरण छुए, क्योंकि वे एक तपस्विनी और गुरु पत्नी थीं। अहल्या की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें गौतम ऋषि की बात याद आई। उन्होंने बड़े प्रेम से राम का स्वागत किया, उन्हें आसन दिया, और जल, फल-फूल से उनका सत्कार किया। आकाश से देवताओं ने फूल बरसाए, और दुंदुभियाँ बज उठीं।

उसी समय महर्षि गौतम भी अपनी तपस्या के बल से सब जान गए और आश्रम लौट आए। उन्होंने अहल्या को फिर से अपनाया। दोनों ने मिलकर राम का पूजन किया। सूने आश्रम में फिर से पक्षी चहचहाने लगे, फूल खिल उठे, और यज्ञ का पवित्र धुआँ उठने लगा। गौतम और अहल्या ने राम को ढेरों आशीर्वाद दिए।
इसके बाद विश्वामित्र जी राम और लक्ष्मण को लेकर आगे मिथिला की ओर चल पड़े, जहाँ राजा जनक का यज्ञ हो रहा था और एक बड़ी घटना उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। रामचरितमानस में अहल्या की स्तुति का एक बहुत सुंदर पद है, जिसमें वे कहती हैं कि प्रभु, मैं अपवित्र थी, आपके चरणों ने मुझे पवित्र कर दिया।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्चे पछतावे और धैर्य भरे तप से हर भूल धुल जाती है। और यह भी कि भगवान किसी से घृणा नहीं करते, वे गिरे हुए को उठाते हैं और सबको अपनाते हैं। राम का नाम सबको पवित्र कर देता है। जय सियाराम!