
पद्मावती और श्रीनिवास
4 मिनट · लक्ष्मी जी की कहानियाँ
एक बार ऋषियों में यह चर्चा हुई कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश में सबसे शांत और महान कौन है। यह जानने के लिए महर्षि भृगु को भेजा गया। भागवत पुराण कहता है कि भृगु पहले ब्रह्मा जी के पास गए, फिर शिव जी के पास, और जान-बूझकर उनका अनादर किया, ताकि उनकी परीक्षा हो सके। दोनों को क्रोध आ गया।
फिर भृगु वैकुंठ पहुँचे, जहाँ भगवान विष्णु शेषनाग पर विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। भृगु ने परीक्षा के लिए भगवान के सीने पर, ठीक वहाँ जहाँ लक्ष्मी जी का वास है, पैर से प्रहार किया। भगवान विष्णु क्रोधित नहीं हुए। वे तुरंत उठे, भृगु के पैर पकड़ लिए और प्यार से बोले, "मुनिवर, मेरे कठोर सीने से आपके कोमल पैर में चोट तो नहीं लगी?"

भगवान की यह विनम्रता देखकर भृगु की आँखें भर आईं, और उन्होंने घोषणा की कि भगवान विष्णु ही सबसे महान हैं। पर माता लक्ष्मी को बहुत बुरा लगा। जिस हृदय में वे रहती थीं, उस पर पैर पड़ा, और भगवान ने कुछ नहीं कहा। रूठकर वे वैकुंठ छोड़कर धरती पर आ गईं और करवीरपुर, यानी आज के कोल्हापुर में तप करने लगीं। वहाँ आज भी महालक्ष्मी का प्रसिद्ध मंदिर है।
लक्ष्मी जी के बिना भगवान विष्णु का मन वैकुंठ में नहीं लगा। वे भी उन्हें खोजते हुए धरती पर आ गए और वेंकटाद्रि पर्वत पर एक इमली के पेड़ के नीचे बाँबी में तप करने लगे। ब्रह्मा जी और शिव जी गाय और बछड़े का रूप लेकर वहाँ आए, और एक चोल रानी की गाय बनकर रोज़ भगवान को दूध पिलाने लगे। उसी पर्वत पर भगवान श्रीनिवास नाम से रहने लगे, और बकुला देवी नाम की एक भक्त माता ने उनकी माँ की तरह सेवा की।
उन्हीं दिनों उस क्षेत्र के राजा आकाश राजा को खेत जोतते समय एक कमल में एक सुंदर बच्ची मिली। कमल में मिलने से उसका नाम पद्मावती रखा गया। परंपरा कहती है कि वे स्वयं माता लक्ष्मी का ही एक रूप थीं। पद्मावती बड़ी होकर बहुत सुंदर, गुणी और भक्ति वाली कन्या बनीं।

एक दिन श्रीनिवास एक जंगली हाथी का पीछा करते हुए घोड़े पर सवार होकर एक बगीचे में पहुँचे, जहाँ पद्मावती अपनी सखियों के साथ फूल चुन रही थीं। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और मन ही मन पहचान गए। बकुला देवी ने आकाश राजा के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा, और राजा ने ख़ुशी-ख़ुशी हाँ कर दी।
पर श्रीनिवास के पास विवाह के लिए धन नहीं था। तब धन के देवता कुबेर ने उन्हें बहुत सारा धन उधार दिया, और श्रीनिवास ने वचन दिया कि कलियुग के अंत तक वे यह कर्ज़ ब्याज सहित चुकाएँगे। बड़ी धूमधाम से विवाह हुआ, जिसमें ब्रह्मा जी, शिव जी और सारे देवता आए। कहते हैं, आज भी भक्त तिरुपति में जो चढ़ावा चढ़ाते हैं, उससे भगवान कुबेर का कर्ज़ चुका रहे हैं।
बाद में माता लक्ष्मी भी कोल्हापुर से आईं, और भगवान ने दोनों को अपने हृदय में स्थान दिया। आज तिरुमला पर्वत पर भगवान वेंकटेश्वर, यानी श्रीनिवास, का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है, और नीचे तिरुचानूर में माता पद्मावती का मंदिर है। भक्त पहले माता पद्मावती के दर्शन करते हैं, फिर ऊपर भगवान के।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सबसे बड़ा वही है जो सबसे विनम्र हो, जैसे भगवान विष्णु ने अपमान के बदले भी प्रेम दिया। और रूठे हुए को मनाने के लिए प्रेम और धैर्य चाहिए। गोविंदा, गोविंदा! जय माता पद्मावती!