
जब लक्ष्मी जी ने स्वर्ग छोड़ा
3 मिनट · लक्ष्मी जी की कहानियाँ
बहुत पुरानी बात है। ऋषि दुर्वासा, जो भगवान शिव के अंश माने जाते हैं, अपने तप और अपने तेज़ क्रोध दोनों के लिए प्रसिद्ध थे। एक दिन वे धरती पर घूम रहे थे, तभी उन्होंने एक विद्याधरी के हाथ में स्वर्ग के फूलों की एक सुंदर माला देखी। उसकी सुगंध से सारा वन महक रहा था। दुर्वासा जी ने वह माला माँगी, और विद्याधरी ने आदर से उन्हें दे दी।
माला लिए दुर्वासा जी आगे बढ़े, तो सामने से देवराज इंद्र अपने सफ़ेद हाथी ऐरावत पर सवार होकर आते दिखे। साथ में देवता भी थे। दुर्वासा जी ने प्रसन्न होकर वह सुगंधित माला इंद्र की ओर बढ़ाई और कहा, "देवराज, यह भेंट स्वीकार करो।" इंद्र ने माला ले तो ली, पर बिना ध्यान दिए उसे ऐरावत के माथे पर डाल दिया।

ऐरावत को माला की गंध तेज़ लगी। उसने सूँड़ से माला उतारकर धरती पर फेंक दी, और अपने पैरों से रौंद डाली। यह देखकर दुर्वासा जी का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। वे बोले, "इंद्र, तुझे स्वर्ग के राज्य और धन का इतना घमंड हो गया है कि तूने मेरी दी हुई भेंट का अनादर किया! जिस लक्ष्मी के घमंड में तू चूर है, वही लक्ष्मी तेरे पास से और तीनों लोकों से चली जाएगी।"
इंद्र घबराकर ऐरावत से उतरे और दुर्वासा जी के पैरों में गिरकर क्षमा माँगने लगे। पर दुर्वासा जी ने कहा, "मैं क्षमा करने वाला नहीं हूँ। जो कहा, वही होगा।" और वे वहाँ से चले गए।

श्राप सच हुआ। उसी पल से माता लक्ष्मी स्वर्ग से जाने लगीं। लक्ष्मी जी केवल सोना-चाँदी नहीं, बल्कि सुंदरता, शक्ति, तेज, अन्न, सौभाग्य और सुख का रूप हैं। उनके जाते ही स्वर्ग का तेज फीका पड़ गया। देवताओं की शक्ति घट गई, पेड़-पौधे मुरझाने लगे, यज्ञ बंद होने लगे, और तीनों लोकों में दरिद्रता छा गई। माता लक्ष्मी स्वर्ग छोड़कर क्षीर सागर की गहराई में समा गईं।
शक्तिहीन देवताओं को देखकर असुरों ने स्वर्ग पर हमला किया और उसे जीत लिया। दुखी देवता ब्रह्मा जी के पास गए, और ब्रह्मा जी उन्हें भगवान विष्णु के पास ले गए। भगवान विष्णु ने मुस्कुराकर कहा, "लक्ष्मी कहीं गई नहीं हैं, वे क्षीर सागर में हैं। असुरों के साथ मिलकर सागर का मंथन करो। लक्ष्मी फिर प्रकट होंगी, और अमृत भी निकलेगा।"
इसी से समुद्र मंथन की कथा शुरू हुई, जिसमें माता लक्ष्मी फिर से प्रकट हुईं। तभी से कहा जाता है कि लक्ष्मी जी वहीं ठहरती हैं जहाँ विनम्रता, आदर और मेहनत हो, और जहाँ घमंड आ जाए, वहाँ से वे चली जाती हैं। इसीलिए उन्हें "चंचला" भी कहते हैं, यानी जो एक जगह टिककर नहीं रहतीं।
हमारे घरों में भी इसी कारण से भोजन, फूल, किताबों और किसी की दी हुई भेंट का आदर करने की सीख दी जाती है। अन्न को पैर नहीं लगाते, और दी हुई चीज़ को लापरवाही से नहीं फेंकते, क्योंकि उनमें भी लक्ष्मी का वास माना जाता है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि धन और पद मिलने पर घमंड नहीं करना चाहिए। किसी की दी हुई छोटी-सी भेंट का भी आदर करना चाहिए। लक्ष्मी जी उसी घर में रहती हैं जहाँ विनम्रता, सफ़ाई और आदर हो। जय माँ लक्ष्मी!