
भस्मासुर का वरदान
4 मिनट · शिव जी की कहानियाँ
भगवान शिव को भोलेनाथ कहते हैं, क्योंकि वे बहुत भोले हैं और जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। उन्हें आशुतोष भी कहते हैं, यानी जो बहुत जल्दी संतुष्ट हो जाएँ। सच्चे मन से थोड़ी-सी भक्ति भी करो, तो वे वर दे देते हैं। उनके इसी भोलेपन की एक प्रसिद्ध कहानी है, भस्मासुर की।
भागवत पुराण में इस असुर का नाम वृकासुर बताया गया है, पर लोग उसे भस्मासुर के नाम से जानते हैं। वह बहुत ताक़तवर था, पर उसके मन में घमंड और लालच भरा था। एक दिन उसने नारद मुनि से पूछा, "मुनिवर, कौन-से देवता सबसे जल्दी प्रसन्न होते हैं?" नारद जी ने कहा, "भगवान शिव। वे थोड़ी-सी तपस्या से ही प्रसन्न हो जाते हैं।"
भस्मासुर केदार क्षेत्र में गया और शिव जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगा। उसका तप दिन-ब-दिन कठिन होता गया। सातवें दिन, जब उसने अपने प्राण तक देने की ठान ली, तब भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए और उसका हाथ पकड़कर रोक लिया। उन्होंने कहा, "बस करो। मैं प्रसन्न हूँ। जो चाहो, वर माँगो।"
भस्मासुर ने तुरंत कहा, "प्रभु, मुझे ऐसा वर दीजिए कि मैं जिसके सिर पर हाथ रखूँ, वह वहीं भस्म हो जाए।" भगवान शिव ने एक पल सोचा, पर भोलेनाथ अपने भक्त को निराश नहीं करते। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "तथास्तु।" यानी, ऐसा ही हो।
वर मिलते ही भस्मासुर के मन में बुराई जाग उठी। उसने सोचा, "देखूँ तो सही, यह वर सच्चा है या नहीं। और अगर शिव ही न रहें, तो माता पार्वती भी मेरी हो जाएँगी।" वह हाथ उठाकर स्वयं भगवान शिव की ओर ही दौड़ पड़ा! जिन्होंने उसे वर दिया, वह उन्हीं को भस्म करना चाहता था।

भगवान शिव अपना दिया हुआ वचन तोड़ नहीं सकते थे। इसलिए वे वहाँ से चल पड़े। आगे-आगे शिव जी, पीछे-पीछे भस्मासुर। पर्वत, नदियाँ, वन, धरती और आकाश, हर जगह वह उनका पीछा करता रहा। देवता डर गए, पर कोई कुछ नहीं कर पा रहा था। आख़िर सब भगवान विष्णु के पास पहुँचे।
भगवान विष्णु ने एक युवा ब्रह्मचारी का रूप लिया। हाथ में दंड, कमर पर मृगछाला, और चेहरे पर तेज। वे भस्मासुर के रास्ते में खड़े हो गए और बहुत आदर से बोले, "अरे, आप तो बहुत थके हुए लगते हैं! इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हैं? थोड़ा रुकिए, अपनी बात मुझे बताइए।"
भस्मासुर ने हाँफते हुए सारी बात बता दी। ब्रह्मचारी हँस पड़ा, "आप भी कितने भोले हैं! शिव जी की बात पर भरोसा कर लिया? उन्हें तो दक्ष ने श्राप दिया था, वे भूत-प्रेतों के साथ रहते हैं। उनका वर सच्चा है, इसका क्या प्रमाण? पहले अपने ही सिर पर हाथ रखकर देख लीजिए। अगर कुछ न हो, तो समझ लेना कि शिव ने झूठ बोला।"

भगवान की माया से भस्मासुर की बुद्धि फिर गई। उसने बिना सोचे अपना ही हाथ अपने सिर पर रख दिया, और उसी पल वह जलकर राख हो गया। आकाश से देवताओं ने फूल बरसाए। भगवान विष्णु ने अपना असली रूप दिखाया, और शिव जी ने उनका धन्यवाद किया।
लोक कथा में यह कहानी थोड़ी अलग तरह से सुनाई जाती है। उसमें भगवान विष्णु सुंदर मोहिनी का रूप लेकर आते हैं और भस्मासुर से कहते हैं कि वह उनके साथ नृत्य करे। नाचते-नाचते मोहिनी अपना हाथ अपने सिर पर रखती हैं, और भस्मासुर भी नकल करते हुए वही करता है, और भस्म हो जाता है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि बुरी नीयत से पाई गई शक्ति आख़िर में अपने ही नाश का कारण बनती है। जो उपकार करने वाले का ही बुरा चाहे, उसका अंत ऐसा ही होता है। और यह भी कि बल से बड़ी बुद्धि होती है। बोलो भोलेनाथ की जय!