
मधु और कैटभ
4 मिनट · दुर्गा जी की कहानियाँ
दुर्गा सप्तशती, जिसे देवी माहात्म्य भी कहते हैं, मार्कंडेय पुराण का एक हिस्सा है। उसकी शुरुआत एक कहानी से होती है। राजा सुरथ अपना राज्य हारकर वन में भटक रहे थे, और समाधि नाम का एक व्यापारी अपने ही परिवार से ठुकराया गया था। दोनों मेधा ऋषि के आश्रम पहुँचे और पूछा, "हमें सब छोड़ गए, फिर भी हमारा मन उन्हीं में क्यों अटका है?" मेधा ऋषि ने कहा, "यह महामाया की शक्ति है। सुनो, मैं तुम्हें देवी की कथा सुनाता हूँ।"
बहुत पहले, जब कोई संसार नहीं था, चारों ओर केवल अनंत जल था, जिसे कारण सागर कहते हैं। उस जल पर भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर गहरी नींद में सोए थे। यह साधारण नींद नहीं थी। उन्हें देवी योगनिद्रा ने अपनी गोद में सुला रखा था। भगवान विष्णु की नाभि से एक कमल निकला, और उस कमल पर ब्रह्मा जी बैठे थे, जो आगे चलकर सृष्टि रचने वाले थे।
भगवान विष्णु के कानों के मैल से दो विशाल असुर पैदा हुए। उनके नाम थे मधु और कैटभ। वे बहुत बलवान थे, और उनके मन में घमंड भरा था। उन्होंने कमल पर बैठे ब्रह्मा जी को देखा और सोचा, "इसे खा जाते हैं।" वे ब्रह्मा जी की ओर बढ़ने लगे।

ब्रह्मा जी घबरा गए। उन्होंने भगवान विष्णु को जगाने की बहुत कोशिश की, पर वे नहीं जागे। तब ब्रह्मा जी समझ गए कि भगवान को जिस शक्ति ने सुला रखा है, वही उन्हें जगा सकती है। उन्होंने हाथ जोड़कर देवी योगनिद्रा की स्तुति की, "हे माँ, तुम ही सारे संसार की शक्ति हो। तुम ही सृष्टि करती हो, तुम ही पालन करती हो। भगवान विष्णु को जगाओ, ताकि वे इन असुरों से हमारी रक्षा करें।"
ब्रह्मा जी की प्रार्थना से देवी प्रसन्न हुईं। वे भगवान विष्णु की आँखों, मुख, नाक, बाहों और हृदय से निकलकर ब्रह्मा जी के सामने प्रकट हुईं। उसी पल भगवान विष्णु की नींद खुल गई। उन्होंने उठकर देखा कि मधु और कैटभ ब्रह्मा जी को डराने के लिए आगे बढ़ रहे हैं।
भगवान विष्णु ने उन दोनों से युद्ध शुरू किया। देवी माहात्म्य कहता है कि यह युद्ध पाँच हज़ार बरस तक चलता रहा, पर दोनों असुर हारे नहीं। देवी ने अपनी माया से उनकी बुद्धि में घमंड भर दिया। वे हँसकर भगवान विष्णु से बोले, "हम तुम्हारी वीरता से बहुत प्रसन्न हैं। तुम हमसे कोई वर माँग लो।"

भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले, "अगर तुम सच में प्रसन्न हो, तो यह वर दो कि तुम दोनों मेरे हाथों हारोगे।" असुर चौंक गए। उन्होंने चारों ओर देखा, हर तरफ़ पानी ही पानी था। उन्होंने चालाकी से कहा, "ठीक है, पर हमें वहाँ हराना जहाँ पानी न हो।" भगवान विष्णु ने अपनी जाँघें फैलाईं, जहाँ कोई पानी नहीं था, और वहीं उन दोनों अहंकारी असुरों का अंत कर दिया।
इसके बाद ब्रह्मा जी ने निडर होकर सृष्टि की रचना शुरू की। मेधा ऋषि ने राजा सुरथ से कहा, "देखा, जो देवी स्वयं भगवान विष्णु को सुला और जगा सकती हैं, वही महामाया हैं। उनकी कृपा से ही मोह छूटता है।" इसीलिए दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय का पाठ देवी के इसी रूप, महाकाली, की स्तुति से होता है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि घमंड बुद्धि को अंधा कर देता है। मधु और कैटभ बहुत बलवान थे, पर घमंड में अपनी ही हार का वर दे बैठे। और यह भी कि संकट में सच्चे मन से माँ को पुकारो, वे ज़रूर सुनती हैं। जय माता दी!