
भक्त प्रह्लाद और नृसिंह भगवान
4 मिनट · विष्णु जी की कहानियाँ
भाई हिरण्याक्ष का अंत होने से हिरण्यकशिपु भगवान विष्णु से बहुत नफ़रत करने लगा। उसने बरसों कठोर तप करके ब्रह्मा जी से एक अनोखा वर माँगा: "मुझे न कोई मनुष्य मार सके, न पशु। न दिन में, न रात में। न घर के भीतर, न बाहर। न धरती पर, न आकाश में। न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से।" वर पाकर उसने ख़ुद को भगवान घोषित कर दिया और आदेश दिया कि कोई विष्णु का नाम न ले।
पर भगवान की लीला देखिए। उसी हिरण्यकशिपु के घर प्रह्लाद नाम का बेटा हुआ, जो जन्म से ही भगवान विष्णु का भक्त था। माँ कयाधु के गर्भ में रहते हुए उसने नारद मुनि से भगवान की कथाएँ सुनी थीं। प्रह्लाद हर समय "नारायण, नारायण" जपता रहता।
हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को गुरु शंड और अमर्क के पास पढ़ने भेजा। पर प्रह्लाद वहाँ भी दूसरे असुर बालकों को भगवान की भक्ति सिखाने लगा। एक दिन हिरण्यकशिपु ने उसे गोद में बिठाकर पूछा, "बेटा, बताओ, तुमने सबसे अच्छी बात क्या सीखी?" प्रह्लाद ने कहा, "पिताजी, भगवान विष्णु का नाम सुनना, गाना और याद करना ही सबसे अच्छी बात है।"

हिरण्यकशिपु आग-बबूला हो गया। उसने अपने ही बेटे को डराने के बहुत उपाय किए। उसे ऊँचे पहाड़ से गिराया गया, पर भगवान ने उसे थाम लिया। उसे हाथियों के आगे डाला गया, पर हाथी उसे छू न सके। उसे विषैले साँपों के बीच छोड़ा गया, पर साँप शांत रहे। लोक परंपरा कहती है कि उसकी बुआ होलिका, जिसे आग में न जलने का वर था, उसे गोद में लेकर आग में बैठी, पर होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। इसी की याद में होली से पहले होलिका दहन होता है।
अंत में एक शाम हिरण्यकशिपु ने गरजकर पूछा, "बता, कहाँ है तेरा विष्णु? क्या वह इस खंभे में भी है?" प्रह्लाद ने शांति से कहा, "पिताजी, भगवान हर जगह हैं, इस खंभे में भी।" हिरण्यकशिपु ने गुस्से में अपनी गदा से खंभे पर ज़ोर से वार किया।
खंभा फट गया, और उसमें से एक भयंकर गर्जना के साथ भगवान नृसिंह प्रकट हुए। उनका सिर सिंह का था और शरीर मनुष्य का, यानी न पूरे मनुष्य, न पूरे पशु। वह समय संध्या का था, न दिन, न रात। भगवान ने हिरण्यकशिपु को महल की देहरी पर, न भीतर न बाहर, अपनी गोद में रखा, जो न धरती थी न आकाश, और अपने नाख़ूनों से, जो न अस्त्र थे न शस्त्र, उसका अंत कर दिया। ब्रह्मा जी का हर वर सच रहा।

भगवान नृसिंह का क्रोध इतना था कि देवता, ब्रह्मा जी, और माता लक्ष्मी भी पास जाने से डर रहे थे। तब सबने नन्हे प्रह्लाद को आगे भेजा। प्रह्लाद बिना डरे भगवान के पास गया और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगा। भगवान का क्रोध पिघल गया। उन्होंने प्रह्लाद को गोद में उठा लिया और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।
भगवान ने कहा, "प्रह्लाद, वर माँगो।" प्रह्लाद ने कहा, "प्रभु, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस मेरे पिता को क्षमा कर दीजिए, और मेरे मन में कभी कोई इच्छा न जागे।" भगवान प्रसन्न हुए और बोले, "तुम्हारे कारण तुम्हारी इक्कीस पीढ़ियाँ तर गईं।" फिर प्रह्लाद राजा बने और धर्म से राज किया। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को नृसिंह जयंती मनाई जाती है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्चे भक्त की रक्षा भगवान स्वयं करते हैं, चाहे कितनी भी बड़ी शक्ति सामने हो। प्रह्लाद ने डर के आगे सिर नहीं झुकाया, और अपने पिता के लिए भी क्षमा माँगी। भगवान हर जगह हैं, एक खंभे में भी। जय नृसिंह भगवान! जय भक्त प्रह्लाद!