
गजेंद्र मोक्ष
3 मिनट · विष्णु जी की कहानियाँ
क्षीर सागर के बीच त्रिकूट नाम का एक सुंदर पर्वत था। उसकी चोटियाँ सोने, चाँदी और लोहे की चमक से जगमगाती थीं, और उसके चारों ओर घने वन, झरने और फलों से लदे पेड़ थे। उसी वन में हाथियों का एक बड़ा झुंड रहता था, जिसका राजा था गजेंद्र। गजेंद्र बहुत बलवान था, और उसके डर से शेर और बाघ भी दूर रहते थे।
एक दिन गर्मी के मौसम में गजेंद्र अपने परिवार के साथ एक बड़े सरोवर में नहाने गया। सरोवर में सुनहरे कमल खिले थे, और उसका पानी ठंडा और मीठा था। हाथियों ने जी भरकर पानी पिया, सूँड़ों से एक-दूसरे पर पानी उछाला, और बच्चे हाथी पानी में खेलने लगे।

तभी पानी में छिपे एक विशाल मगरमच्छ ने गजेंद्र का पैर पकड़ लिया। गजेंद्र ने पूरी ताक़त से पैर खींचा, पर मगरमच्छ ने नहीं छोड़ा। उसकी पत्नियों और साथियों ने भी मिलकर खींचा, पर कुछ नहीं हुआ। भागवत पुराण कहता है कि यह खींचतान हज़ार बरस तक चलती रही। पानी में मगरमच्छ का बल बढ़ता गया, और गजेंद्र का बल घटता गया। धीरे-धीरे उसके साथी भी थककर उसे छोड़ गए।
अब गजेंद्र अकेला था, थका हुआ और कमज़ोर। उसे लगा कि अब कोई नहीं बचाएगा। तभी उसे अपने पिछले जन्म की बात याद आई। पिछले जन्म में वह इंद्रद्युम्न नाम का एक राजा था, जो भगवान विष्णु का बड़ा भक्त था। एक ऋषि के श्राप से वह हाथी बना था, पर भगवान की भक्ति उसके मन में बची थी।
गजेंद्र ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर सरोवर से एक कमल तोड़ा, उसे सूँड़ में ऊपर उठाया, और मन से भगवान को पुकारा, "हे नारायण! हे जगत के आधार! जिसकी शरण में सारा संसार है, मैं उसी की शरण में हूँ। अब मेरा कोई सहारा नहीं, मुझे बचाइए।" उसकी यह प्रार्थना गजेंद्र स्तुति कहलाती है।
गजेंद्र की सच्ची पुकार सुनते ही भगवान विष्णु एक पल भी नहीं रुके। वे गरुड़ पर बैठकर इतनी तेज़ी से दौड़े कि गरुड़ भी पीछे छूटने लगे, तो भगवान स्वयं गरुड़ से उतरकर सरोवर की ओर बढ़ आए। उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र चलाया, जिसने मगरमच्छ की पकड़ छुड़ा दी, और गजेंद्र को किनारे पर खींच लिया।

उसी पल एक और चमत्कार हुआ। मगरमच्छ के शरीर से एक सुंदर गंधर्व निकला, जिसका नाम हूहू था। वह भी एक ऋषि के श्राप से मगरमच्छ बना था। भगवान के चक्र के स्पर्श से वह भी मुक्त हो गया, और उसने भगवान को प्रणाम करके अपने लोक की राह ली। गजेंद्र को भी भगवान ने मुक्ति दी और अपना पार्षद बना लिया।
भगवान ने कहा, "जो भी सुबह उठकर गजेंद्र की इस स्तुति को याद करेगा, उसे बुरे सपने और संकट नहीं सताएँगे।" आज भी बहुत से भक्त संकट के समय गजेंद्र मोक्ष की कथा और स्तुति पढ़ते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि जब सारे सहारे छूट जाएँ, तब भी भगवान का सहारा बना रहता है। बल पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि बल एक दिन थक जाता है, पर सच्ची भक्ति कभी नहीं थकती। और सच्चे मन की एक पुकार भगवान तक तुरंत पहुँचती है। ॐ नमो नारायणाय!