
मूषक बना गणेश जी का वाहन
4 मिनट · गणेश जी की कहानियाँ
बहुत पुरानी बात है। देवराज इंद्र की सभा में एक गंधर्व था, जिसका नाम था क्रौंच। गंधर्व बहुत अच्छा गाते और बजाते हैं, पर क्रौंच अपनी कला पर बहुत घमंड करता था। एक दिन सभा में बहुत भीड़ थी, और क्रौंच बिना देखे इधर-उधर चल रहा था। चलते-चलते उसका पैर वहाँ बैठे महान ऋषि वामदेव के पैर पर पड़ गया।
वामदेव ऋषि को बहुत पीड़ा हुई, और क्रौंच ने माफ़ी तक नहीं माँगी। ऋषि ने क्रोध में कहा, "तुम्हें अपनी बड़ाई पर इतना घमंड है कि तुम्हें दूसरों का ध्यान ही नहीं? जाओ, तुम चूहा बन जाओ, जो ज़मीन पर रेंगता है और हर चीज़ कुतरता है।" उसी पल क्रौंच एक मूषक, यानी चूहा, बन गया।
अब क्रौंच को अपनी भूल समझ आई। वह रोते हुए ऋषि के पैरों में गिर पड़ा और क्षमा माँगने लगा। ऋषि का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने कहा, "दिया हुआ श्राप वापस नहीं होता, पर एक दिन तुम भगवान गणेश के वाहन बनोगे। तब तुम्हारा जीवन धन्य हो जाएगा।"

श्राप के बाद क्रौंच इंद्र की सभा से सीधे धरती पर आ गिरा। वह जंगलों में भटकने लगा, और जहाँ जाता, वहाँ कुछ न कुछ कुतर डालता। भटकते-भटकते वह पराशर ऋषि के आश्रम के पास पहुँच गया।
पर मूषक बनकर भी क्रौंच का स्वभाव नहीं बदला। वह पहाड़ जितना बड़ा मूषक बन गया और धरती पर उत्पात मचाने लगा। एक दिन वह पराशर ऋषि के आश्रम में घुस गया। उसने आश्रम के बर्तन तोड़ दिए, अनाज खा गया, पेड़ उखाड़ दिए और ऋषियों के वस्त्र और ग्रंथ तक कुतर डाले। आश्रम के सब लोग डर गए।
पराशर ऋषि बहुत दुखी हुए। उन्होंने सोचा, "यह कोई साधारण चूहा नहीं है। इतने बड़े विघ्न को केवल विघ्नहर्ता ही दूर कर सकते हैं।" आश्रम के सब ऋषि हाथ जोड़कर गणेश जी से प्रार्थना करने लगे, "हे गणपति, इस संकट से हमें बचाइए।"
उन दिनों बालक गणेश पराशर ऋषि के आश्रम में ही रहते थे। ऋषियों की प्रार्थना सुनकर उन्होंने कहा, "आप चिंता मत कीजिए, मैं इस मूषक को सँभाल लूँगा।" गणेश जी ने अपना पाश, यानी चमकती हुई रस्सी, फेंकी। वह पाश घूमता हुआ धरती के नीचे तक गया और उस बड़े मूषक के गले में जाकर फँस गया। मूषक को खींचकर गणेश जी के सामने लाया गया।

मूषक ने छूटने के लिए बहुत ज़ोर लगाया, उछला, पटका, पर गणेश जी के सामने उसकी एक न चली। तब भी उसका घमंड नहीं गया। गणेश जी ने कहा, "माँगो, क्या वरदान चाहिए?" मूषक घमंड से बोला, "मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। आप चाहें तो मुझसे वरदान माँग लीजिए।" गणेश जी मुस्कुराए और बोले, "ठीक है, तो आज से तुम मेरे वाहन बनो।"
मूषक मना नहीं कर सका। जैसे ही गणेश जी उस पर बैठे, उनके भार से मूषक दबने लगा। तब उसका घमंड टूटा। उसने विनती की, "प्रभु, मुझे क्षमा करें। अपना भार थोड़ा कम कर दीजिए, ताकि मैं आपकी सेवा कर सकूँ।" गणेश जी ने अपना भार हल्का कर लिया। तभी से मूषक गणेश जी का प्रिय वाहन है, और ऋषि का वचन भी सच हुआ।
आज भी हर गणेश मंदिर में गणेश जी के सामने उनका मूषक बैठा होता है। बहुत से भक्त मूषक के कान में धीरे से अपनी मनोकामना कहते हैं, ताकि वह उसे गणेश जी तक पहुँचा दे। कहते हैं कि मूषक हमारे चंचल मन जैसा है, जो हर चीज़ कुतरना चाहता है। जब गणेश जी, यानी बुद्धि, उस पर सवार होती है, तब वही मन हमारी सेवा करने लगता है।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि घमंड हमेशा दुख देता है, और गलती होने पर माफ़ी माँगनी चाहिए। गणेश जी ने घमंडी मूषक को भी अपनाया और उसे सबसे बड़ा सम्मान दिया। भगवान बड़े से बड़े घमंड को भी प्रेम से जीत लेते हैं।