
कुबेर का भोज
4 मिनट · गणेश जी की कहानियाँ
कुबेर धन के देवता हैं। वे ऋषि विश्रवा के पुत्र थे, और रावण उनका सौतेला भाई था। पहले सोने की लंका कुबेर की ही थी, पर रावण ने उसे छीन लिया। तब कुबेर ने हिमालय में अलकापुरी नाम की सुंदर नगरी बसाई। ब्रह्मा जी ने उन्हें देवताओं के खज़ाने का रक्षक बनाया था।
अलकापुरी सोने और रत्नों से भरी थी। धीरे-धीरे कुबेर को अपनी दौलत पर बहुत घमंड होने लगा। वे सोचते, "तीनों लोकों में मुझसे धनी कोई नहीं।" वे चाहते थे कि सब देवता देखें कि उनके पास कितना वैभव है।
एक दिन कुबेर ने एक बहुत बड़ा भोज रखने का निश्चय किया। वे कैलाश गए और शिव जी और माता पार्वती को आमंत्रित किया, "प्रभु, मेरे महल में भोज है, आप पधारिए।" शिव जी उनके मन का घमंड समझ गए। मुस्कुराकर बोले, "मैं तो नहीं आ पाऊँगा, पर मेरा पुत्र गणेश तुम्हारे साथ जाएगा। उसे भोजन बहुत प्रिय है।"
कुबेर बालक गणेश को बड़े ठाठ से अलकापुरी ले गए। भोजन से पहले उन्होंने गणेश जी को पूरा महल घुमाया। रत्नों से जड़े खंभे, सोने के फव्वारे, और हीरे-मोतियों से भरे खज़ाने के कमरे दिखाए। हर जगह वे कहते, "देखो, यह सब मेरा है।" गणेश जी चुपचाप मुस्कुराते रहे। वे समझ गए थे कि पिताजी ने उन्हें यहाँ क्यों भेजा है।
फिर वे भोजन के बड़े कक्ष में पहुँचे, जहाँ सोने की थालियों में सैकड़ों पकवान सजे थे, मिठाइयाँ, फल, खीर, पूरी, और ढेरों मोदक। कुबेर ने गर्व से कहा, "जितना चाहो उतना खाओ। मेरे भंडार कभी खाली नहीं होते।"

गणेश जी ने खाना शुरू किया। एक थाली खत्म, फिर दूसरी, फिर दसवीं, फिर सौवीं। रसोई में जितना बना था, सब खत्म हो गया। रसोइए और पकाते गए, और गणेश जी खाते गए। फिर भी उनकी भूख शांत नहीं हुई। देखते-देखते कुबेर के सारे भंडार खाली हो गए।
तब गणेश जी ने महल की सजावट, बर्तन और सामान तक खाना शुरू कर दिया। फिर उन्होंने कुबेर की ओर देखकर कहा, "मुझे अब भी भूख लगी है। और कुछ नहीं है, तो मैं तुम्हें ही खा लूँ?" कुबेर डर से काँपने लगे। उनका सारा घमंड पल भर में चूर हो गया। वे भागते हुए कैलाश पहुँचे और शिव जी के चरणों में गिर पड़े।

कुबेर ने रोते हुए कहा, "प्रभु, मुझे बचाइए। मेरे सारे भंडार खाली हो गए, फिर भी गणेश की भूख नहीं मिटी।" शिव जी ने शांति से उन्हें एक मुट्ठी भुने हुए चावल दिए और कहा, "यह ले जाओ, और इसे घमंड छोड़कर, पूरे प्रेम और विनम्रता से गणेश को खिलाओ।"
कुबेर लौटे और हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर, वे मुट्ठी भर चावल प्रेम से गणेश जी के सामने रखे। गणेश जी ने वे दाने खाए और तुरंत तृप्त हो गए।
गणेश जी ने मुस्कुराकर कहा, "कुबेर, मुझे तुम्हारे पकवानों की भूख नहीं थी। तुम्हारे सारे भंडार मेरा पेट नहीं भर सके, क्योंकि उनमें घमंड मिला था। इन थोड़े-से चावलों में प्रेम था, इसलिए मेरा पेट भर गया।" कुबेर की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने गणेश जी के चरण छुए और वचन दिया कि वे फिर कभी अपने धन पर घमंड नहीं करेंगे। गणेश जी ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। कुबेर समझ गए कि भगवान को धन-दौलत का दिखावा नहीं, सच्चा प्रेम और भक्ति चाहिए।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि घमंड चाहे धन का हो या किसी और चीज़ का, वह कभी टिकता नहीं। प्रेम से दिया गया छोटा-सा भोग भी भगवान को सबसे बड़ा लगता है। इसीलिए हम गणेश जी को प्रेम से दूर्वा और एक मोदक भी चढ़ाएँ, तो वे प्रसन्न हो जाते हैं। और आज भी दीवाली पर लक्ष्मी जी और गणेश जी के साथ कुबेर जी की पूजा होती है, ताकि घर में धन भी आए और उसके साथ विनम्रता भी बनी रहे।