
मोतियों की माला
4 मिनट · हनुमान जी की कहानियाँ
रावण पर विजय के बाद श्री राम, सीता माता और लक्ष्मण जी चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे। पूरी अयोध्या दीपों से जगमगा उठी। कुछ दिन बाद बड़े धूमधाम से श्री राम का राज्याभिषेक हुआ। सुग्रीव, विभीषण, अंगद, जाम्बवान और सारे वानर भी इस उत्सव में आए थे।
राज्याभिषेक के बाद श्री राम ने सबको प्रेम से उपहार दिए। किसी को रत्न, किसी को वस्त्र, किसी को आभूषण। सबसे अंत में सीता माता ने अपने गले से मोतियों की एक बहुत सुंदर, अनमोल माला उतारी। उन्होंने श्री राम की ओर देखा, मानो पूछ रही हों कि यह किसे दूँ।
श्री राम मुस्कुराए और बोले, "सीते, जिस पर तुम सबसे अधिक प्रसन्न हो, जिसमें तेज, धैर्य, यश, चतुराई, बल, विनय और बुद्धि सब हों, उसे दे दो।" सीता माता ने बिना एक पल सोचे वह माला हनुमान जी को दे दी। वाल्मीकि रामायण में भी यही आता है कि सीता माता ने अपनी माला हनुमान जी को दी, और उसे पहनकर वे ऐसे शोभा पा रहे थे जैसे चाँदनी से चमकता पर्वत।

हनुमान जी ने माला को बड़े आदर से लिया और एक कोने में जाकर बैठ गए। फिर वे एक-एक मोती को उलट-पलटकर ध्यान से देखने लगे। कभी किसी मोती को कान के पास ले जाते, कभी उसे दाँत से तोड़कर अंदर झाँकते, और फिर निराश होकर उसे एक ओर रख देते।
यह देखकर दरबार में सब हैरान रह गए। कुछ लोग मन ही मन हँसने भी लगे, "वानर है न, मोतियों का मोल क्या जाने।" आखिर विभीषण से रहा नहीं गया। उन्होंने पूछा, "हनुमान जी, यह तो माता सीता की दी हुई अनमोल माला है। आप इसके मोती तोड़ क्यों रहे हैं?"

हनुमान जी ने भोलेपन से उत्तर दिया, "मैं देख रहा हूँ कि इन मोतियों में मेरे प्रभु राम हैं या नहीं। जिस चीज़ में राम नहीं, वह मेरे लिए किसी काम की नहीं। पर इनमें से किसी में भी मुझे राम नहीं मिले।"
यह सुनकर एक दरबारी ने हँसकर कहा, "अगर ऐसा है, तो क्या आपके अपने शरीर में राम हैं? अगर नहीं, तो फिर यह शरीर भी आपके किसी काम का नहीं।" हनुमान जी ने शांति से कहा, "मेरे शरीर के रोम-रोम में राम हैं। देखिए।" और उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपना सीना खोल दिया।
पूरा दरबार देखता रह गया। हनुमान जी के हृदय में श्री राम और सीता माता विराजमान थे, एक दिव्य प्रकाश में, मुस्कुराते हुए। जो लोग हँस रहे थे, वे शर्म से सिर झुकाकर हाथ जोड़ने लगे। हनुमान चालीसा में भी आता है, "प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया", यानी हनुमान जी के मन में राम, लक्ष्मण और सीता बसते हैं।
श्री राम सिंहासन से उठकर हनुमान जी के पास आए और उन्हें गले से लगा लिया। उनके स्पर्श से हनुमान जी का सीना पहले जैसा हो गया। श्री राम ने कहा, "हनुमान, तुम्हारी भक्ति का मोल कोई माला नहीं चुका सकती।"
कुछ समय बाद जब सब वानर विदा होने लगे, तो हनुमान जी ने श्री राम से एक ही वरदान माँगा, "प्रभु, जब तक संसार में आपकी कथा कही जाएगी, तब तक मैं धरती पर रहूँ और आपकी कथा सुनता रहूँ।" श्री राम ने यह वरदान दिया। इसीलिए कहते हैं कि जहाँ भी राम कथा होती है, वहाँ हनुमान जी किसी न किसी रूप में ज़रूर आते हैं।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्ची भक्ति दिखावे या धन में नहीं, मन में होती है। किसी के भोलेपन पर हँसना नहीं चाहिए, क्योंकि हो सकता है उसके मन में हमसे कहीं बड़ा सच बसा हो। बोलो सियावर रामचंद्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय!