
हनुमान जी का जन्म
4 मिनट · हनुमान जी की कहानियाँ
बहुत पुरानी बात है। देवराज इंद्र की सभा में पुंजिकस्थला नाम की एक सुंदर अप्सरा थी। वह बहुत चंचल थी। एक दिन खेल-खेल में उसने तप कर रहे एक ऋषि का ध्यान भंग कर दिया। ऋषि ने आँखें खोलीं और कहा, "तुम वानरों की तरह चंचल हो, इसलिए धरती पर वानरी बनकर जन्म लोगी।" पुंजिकस्थला ने रोते हुए क्षमा माँगी। ऋषि का मन पिघला और बोले, "चिंता मत करो। उसी जन्म में तुम्हें ऐसा पुत्र मिलेगा, जिसका नाम युगों-युगों तक लिया जाएगा।"
श्राप के कारण पुंजिकस्थला ने धरती पर वानरराज कुंजर की बेटी बनकर जन्म लिया। उनका नाम रखा गया अंजना। अंजना बहुत सुंदर, गुणी और भक्ति वाली थीं। बड़ी होने पर उनका विवाह सुमेरु पर्वत के वानरराज केसरी से हुआ। केसरी बहुत बलवान और धर्म को मानने वाले राजा थे। दोनों प्रेम से रहते थे, पर उनके कोई संतान नहीं थी।
संतान की इच्छा से माता अंजना ने भगवान शिव की कठिन तपस्या शुरू की। वे एक पर्वत पर बैठकर दिन-रात शिव जी का ध्यान करतीं। न धूप की चिंता, न वर्षा की। बरसों तक उनका तप चलता रहा। उनकी सच्ची भक्ति देखकर शिव जी प्रसन्न हुए और बोले, "वर माँगो।" अंजना ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, मुझे ऐसा पुत्र दीजिए जो बलवान हो, बुद्धिमान हो और सदा धर्म के साथ रहे।"

शिव जी ने कहा, "ऐसा ही होगा। मेरा ही एक अंश तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लेगा।" शिव पुराण में आता है कि भगवान राम की सेवा के लिए शिव जी ने स्वयं रुद्र के अवतार के रूप में हनुमान बनकर जन्म लिया। इसीलिए हनुमान चालीसा में उन्हें "शंकर सुवन केसरी नंदन" कहा गया है।
एक दिन माता अंजना सुंदर वस्त्र और फूलों की माला पहने पर्वत की चोटी पर घूम रही थीं। तभी पवन देव, यानी वायु देवता, धीरे से उनके पास आए। उनके स्पर्श से अंजना चौंक गईं। पवन देव ने आदर से कहा, "माता, डरिए मत। मैं आपके व्रत को भंग नहीं कर रहा। मेरे आशीर्वाद से आपको ऐसा पुत्र मिलेगा जो मेरे जैसा तेज़ चलेगा, मेरे जैसा बलवान होगा, और बुद्धि में सबसे आगे होगा।"
एक कथा यह भी कहती है कि उन्हीं दिनों अयोध्या में राजा दशरथ पुत्र पाने के लिए यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ से निकली खीर उन्होंने अपनी तीनों रानियों में बाँटी। उस खीर का एक छोटा-सा भाग एक पक्षी उठाकर उड़ गया, और पवन देव ने उसे उड़ाकर तपस्या कर रहीं अंजना के हाथों में पहुँचा दिया। अंजना ने उसे शिव जी का प्रसाद मानकर खा लिया।
समय आने पर माता अंजना ने एक सुंदर, तेजस्वी बालक को जन्म दिया। बालक के चेहरे पर सूरज जैसी चमक थी। केसरी जी खुशी से झूम उठे। पूरे पर्वत पर वानरों ने उत्सव मनाया। पेड़ों पर फूल खिल उठे, और ठंडी हवा बहने लगी, मानो पवन देव स्वयं अपने पुत्र को आशीर्वाद देने आए हों।
कहते हैं कि यह शुभ दिन चैत्र महीने की पूर्णिमा थी। इसीलिए आज भी चैत्र पूर्णिमा को हनुमान जयंती मनाई जाती है। उस दिन मंदिरों में हनुमान चालीसा का पाठ होता है, और भक्त हनुमान जी को सिंदूर और लड्डू चढ़ाते हैं।
बालक के कई नाम पड़े। माता अंजना के पुत्र होने से वे आंजनेय कहलाए, और पिता केसरी के पुत्र होने से केसरी नंदन। पवन देव के आशीर्वाद से जन्मे थे, इसलिए उन्हें पवनपुत्र और मारुति भी कहते हैं। हनुमान चालीसा में भी आता है, "अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।"

बाल हनुमान बहुत चंचल और नटखट थे। वे पलक झपकते ही एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूद जाते। माता अंजना उन्हें गोद में बिठाकर भगवान की कहानियाँ सुनातीं, और उन्हें सिखातीं कि सच्चा बल वही है जो दूसरों की सेवा में लगे। यही सीख आगे चलकर हनुमान जी के पूरे जीवन की पहचान बनी।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्ची भक्ति और धैर्य का फल ज़रूर मिलता है। माता अंजना ने बरसों तप किया, तब उन्हें ऐसा पुत्र मिला जिसे आज सारा संसार बल, बुद्धि और भक्ति के देवता के रूप में पूजता है। बोलो पवनपुत्र हनुमान की जय!